✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | “कोयला बचाने के चक्कर में सरकार ने हीरा गंवा दिया”- भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों के ऐतिहासिक महा-पलायन पर दलाल स्ट्रीट के दिग्गजों और आर्थिक गलियारों में कुछ इसी तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। केंद्र सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और विशेष रूप से कैपिटल गेन टैक्स (Capital Gains Tax) के मोर्चे पर की गई आक्रामक सख्ती ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) को इस कदर नाराज किया कि उन्होंने भारतीय इक्विटी मार्केट से अपना हाथ पूरी तरह खींच लिया है।
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) और सेबी (SEBI) को सौंपे गए कस्टोडियन्स के प्रामाणिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 17 महीनों में विदेशी फंड्स द्वारा की गई लगभग 3.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक की यह शुद्ध निकासी भारतीय बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे आक्रामक आउटफ्लो बन चुका है, जिसने बाजार की तरलता (Liquidity) को सुखा दिया है।
मुनाफे पर टैक्स की चोट, 2026 में आया बिकवाली का तूफान
बिजनेस विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सरकार द्वारा कैपिटल गेन टैक्स के नियमों में किए गए हालिया बदलावों ने सीधे विदेशी फंड्स के नेट रिटर्न (मुनाफे) पर प्रहार किया। इसके चलते, जो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार के ऊंचे वैल्युएशन और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच पहले से ही सतर्क थे, वे इस टैक्स नीति के बाद पूरी तरह आक्रामक सेलर्स में तब्दील हो गए। इसका नतीजा यह हुआ कि कैलेंडर वर्ष 2025 में जो निकासी 1.58 लाख करोड़ से 1.66 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर थी, वह साल 2026 के शुरुआती पांच महीनों में एक बेकाबू तूफान बन गई।
NSDL के 29 मई 2026 तक के आधिकारिक डेटा के मुताबिक, इस साल जनवरी से मई के बीच ही इक्विटी सेगमेंट से कुल नेट आउटफ्लो -2,24,932 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, यानी महज 5 महीनों की बिकवाली ने 2025 के पूरे साल के रिकॉर्ड को बहुत पीछे छोड़ दिया।
मार्च 2026: भारतीय इक्विटी के इतिहास का सबसे काला महीना
कस्टोडियल डेटा के विश्लेषण से साफ है कि इस पूरी अवधि में मार्च 2026 का महीना भारतीय शेयर बाजार के लिए सबसे विनाशकारी साबित हुआ, जब अकेले एक महीने में विदेशी निवेशकों ने बाजार से रिकॉर्ड 1,17,775 करोड़ रुपये की अभूर्व पूंजी समेट ली। इसके अलावा, जनवरी में 35,962 करोड़ रुपये, अप्रैल में 60,847 करोड़ रुपये और मई में 29 तारीख तक 32,963 करोड़ रुपये की निरंतर बिकवाली ने बाजार को पस्त कर दिया। इस पूरे दौर में केवल फरवरी 2026 (+22,615 करोड़ रुपये) ही एक ऐसा इकलौता अपवाद रहा, जहां मामूली खरीदारी दिखी थी।
वित्तीय रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड जैसे वैश्विक फैक्टर्स तो अपनी जगह थे ही, लेकिन भारतीय नीति-निर्माताओं द्वारा थोपे गए टैक्स के मोर्चे ने घरेलू बाजार के सेंटिमेंट और निवेशकों के भरोसे को सबसे गहरी चोट पहुंचाई है।
