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चारधाम परियोजना: AI युग में आस्था की राजनीति, कटते हिमालय और धार्मिक पर्यटन का विस्फोट

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  • AI की दुनिया में ‘आस्था एक्सप्रेस’: हिमालय बिक रहा है, भीड़ बढ़ रही है और सरकार इसे विकास बता रही है

  • चारधाम में रिकॉर्ड भीड़, हिमालय में विस्फोट और सत्ता के लिए आस्था सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल

✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली/देहरादून | दुनिया इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष विज्ञान की नई दौड़ में है। महाशक्तियां अपने युवाओं को वैज्ञानिक, इंजीनियर और रिसर्चर बनाने में लगी हैं। लेकिन भारत में पिछले दस वर्षों में विकास की सबसे आक्रामक तस्वीर लैबोरेट्री, विश्वविद्यालय या इंडस्ट्रियल कॉरिडोर नहीं, बल्कि मंदिरों तक जाती चौड़ी सड़कें, कटते पहाड़ और ‘रिकॉर्ड श्रद्धालुओं’ की राजनीतिक ब्रांडिंग बनकर उभरी है।

उत्तराखंड के चारधाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री अब सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं रहे, बल्कि सत्ता के सबसे बड़े ‘इमोशनल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ में बदल चुके हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2014 में बद्रीनाथ आने वाले यात्रियों की संख्या 1.8 लाख थी, जो 2024 तक बढ़कर 14.35 लाख हो गई। केदारनाथ में तो यह उछाल सीधे चालीस गुना तक पहुंच गया 40,800 से 16.52 लाख। गंगोत्री और यमुनोत्री में भी श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। सरकार इसे विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण बता रही है, लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या यही वह ‘नया भारत’ है, जिसकी नींव विज्ञान और तकनीक पर रखी जानी थी?

करीब 12 हजार करोड़ रुपये की चारधाम परियोजना ने हिमालय को विशाल निर्माण स्थल में बदल दिया है। पहाड़ों को विस्फोट से काटा जा रहा है, जंगल साफ किए जा रहे हैं और संवेदनशील ढलानों पर चौड़ी सड़कें बिछाई जा रही हैं। कभी कठिन तपस्या मानी जाने वाली केदारनाथ यात्रा को अब रोपवे के जरिए 36 मिनट का ‘स्पिरिचुअल पैकेज’ बनाने की तैयारी है। यानी श्रद्धा भी अब बाजार की भाषा में बेची जाएगी वीआईपी दर्शन, हेलीकॉप्टर सेवा, लग्जरी होटल और एक्सप्रेस मोक्ष के साथ।

राजनीतिक गलियारों में इसे सिर्फ धार्मिक परियोजना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सत्ता मॉडल माना जा रहा है। बेरोजगारी, शिक्षा संकट, गिरती रिसर्च फंडिंग और उद्योगों में रोजगार की कमी जैसे सवालों के बीच ‘आस्था’ सबसे सुरक्षित राजनीतिक निवेश बन चुकी है। मंदिरों की भीड़ को विकास का प्रमाणपत्र बताया जा रहा है और धार्मिक पर्यटन को आर्थिक क्रांति की तरह प्रचारित किया जा रहा है।

विडंबना यह है कि जिस दौर में दुनिया AI इंजीनियर तैयार कर रही है, उस दौर में भारत करोड़ों युवाओं को तीर्थ पर्यटन आधारित अस्थायी रोजगार अर्थव्यवस्था की ओर धकेलता दिखाई दे रहा है। रिसर्च लैब की जगह रोपवे उद्घाटन सुर्खियां बन रहे हैं। वैज्ञानिक चेतना की जगह धार्मिक प्रदर्शन राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन चुका है।

हिमालय, जिसे दुनिया सबसे संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में गिनती है, अब राजनीतिक प्रदर्शन और कॉरपोरेट पर्यटन का नया मैदान बन गया है। पहाड़ टूट रहे हैं, नदियों पर दबाव बढ़ रहा है और पर्यावरणीय चेतावनियां लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन सत्ता के लिए सबसे अहम तस्वीर वही है जिसमें लाखों श्रद्धालु कैमरे के सामने उमड़ते दिखें।

भारत शायद पहली बार ऐसी दिशा में खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां विकास की सबसे बड़ी पहचान वैज्ञानिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि धार्मिक भीड़ का आकार बनता जा रहा है। और यही इस दौर की सबसे तीखी राजनीतिक सच्चाई है दुनिया भविष्य की टेक्नोलॉजी बना रही है, जबकि भारत ‘मोक्ष अर्थव्यवस्था’ को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि की तरह बेच रहा है।


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