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अयोध्या: सूखते सब्ज़ बाग़ और सन्नाटे में डूबी रामनगरी

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एक रिपोर्ट:

एक वक्त था जब अयोध्या की सड़कों पर श्रद्धालुओं की रेलमपेल देखकर यह भ्रम पैदा हुआ था कि यहां की धड़कन अब कभी मंद नहीं होगी। लेकिन आज वही अयोध्या अपनी ही कल्पना की चकाचौंध में थककर चुप है। राम मंदिर के नाम पर गढ़े गए ‘विकास’ और ‘धार्मिक पर्यटन’ के सपनों की चादर अब कई जगहों से फट चुकी है।

जहां कभी भाजपा सरकार ने दावा किया था कि मंदिर निर्माण के बाद श्रद्धालुओं की बाढ़ अयोध्या को रोजगार और समृद्धि का केंद्र बनाएगी, आज वहां के दुकानदार, तीर्थ पुरोहित और होटल कारोबारी खाली जेब और भरे दिल लिए बैठें हैं। रामलला की तस्वीरें जो कभी थोक में बिकती थीं, अब दिन भर में गिनी-चुनी बिक रही हैं। फूल बेचने वाले, तिलक लगाने वाले और ‘जय श्रीराम’ लिखने वाले युवाओं की उम्मीदें मुरझा चुकी हैं।

यह वही अयोध्या है, जिसे दुनिया के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर लाने की बात करते हुए, सरकार ने आंकड़ों की बौछार की थी—16 करोड़ श्रद्धालुओं का दावा, सैकड़ों करोड़ के राजस्व की कल्पना, और रामराज्य के लौट आने की भविष्यवाणी। लेकिन ये ‘दावे’ अब उसी तरह खोखले लगते हैं, जैसे चुनावी मौसम में बांटे गए वादों के पर्चे।

जो बूम कभी हेलीकॉप्टर सेवा तक ले गया था, वह अब ज़मीन पर आकर दम तोड़ रहा है। एयर सफारी की उड़ानें बंद हो चुकी हैं, होटलों में बुकिंग नहीं, स्ट्रीट फूड दुकानों पर सन्नाटा, और तीर्थ पुरोहित घाटों पर खाली बैठे हैं। मंदिर के उद्घाटन के बाद के महीनों में जो भीड़ दिखाई दी, वह अब ‘प्रायोजित उत्साह’ साबित होती दिख रही है। क्या यह सच नहीं कि भक्तों की भीड़ को भाजपा की चुनावी राजनीति ने मंच की तरह इस्तेमाल किया?

मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार से लेकर पर्यटन मंत्री तक, सबने ‘अर्थव्यवस्था के रामायण’ के स्वर्ण युग की कथा गढ़ी, लेकिन अयोध्या के व्यापारी आज बाजार में अपने ही भरोसे लड़ रहे हैं। ऑनलाइन ट्रेडिंग और बाहरी पूंजी के सामने स्थानीय कारोबारियों का दम घुटने लगा है। ज़मीनें कब्जा ली गईं, सपने गिरवी रखे गए, और जब बूम का नाटक खत्म हुआ, तो पीछे रह गया एक ऐसा मंच, जिस पर अब कोई नायक नहीं, सिर्फ़ पीड़ित पात्र है।


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