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उठ, आंखें खोल, देख, प्राची दिशा का ललाट सिंदूर रंजित हो उठा…

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  • भगत सिंह जयंती पर विशेष संपादकीय :

देश की आजादी के बाद संवादमाध्यम सीमित थे, इसलिए दुष्प्रचार के खतरे भी कम थे। तब राजनेताओं पर बड़ी जिम्मेदारी थी, उनके पास बड़े अवसर थे, वे आजादी की लड़ाई में की गई गलतियों को स्वीकार करते और उन लोगों के विचारों को आगे बढ़ाते, जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। शहादत दी। लेकिन ऐसा होता कम ही दिखा।

यह सही है कि हर क्षेत्र की अपनी सीमाएं हैं। लेकिन इन सीमाओं को खींचने वाले लोग भी इन्हीं क्षेत्र के पूर्वज हुआ करते हैं। बाद में इन पूर्वजों का स्थान व्यवस्था ले लेती है। फिर व्यवस्था की निर्ममता पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती जाती है। समझ नहीं आता कि तहसील कार्यालय में जो आवेदन फॉर्म मुफ्त मिलना चाहिए, वह सामने की फोटोकॉपी की दुकान पर पांच या दस रुपए में क्यों बिकता है? हर दल की सरकार के कार्यकाल में यही व्यवस्था रही है।

क्या आपने कभी तहसील कार्यालय के सामने गरीब बुजुर्ग मनोविकृत सी महिला को चीखते-चिल्लाते देखा है। हां, वही महिला जो पति के गुजर जाने के बाद उसकी संपत्ति अपने नाम कराने के लिए दर-दर भटक रही है। समझ नहीं आता, कौन सा कागज लाए। कौन सा न लाए, और लाए भी तो कहां से लाए।

लोग अन्याय की शिकायत करने के लिए पुलिस के पास जाने से क्यों डरते हैं? कुछ साल पहले मैंने एक पुलिस स्टेशन में देखा था। एक महिला ससुराल के अत्याचार की शिकायत करने के लिए बुजुर्ग माता-पिता के साथ यहां कतार में खड़ी थी। वहीं दो फीट की दूरी पर लॉकअप था। पुलिस आरोपियों को बेतहाशा पीट रही थी।

पुलिसकर्मी थाने में आए आम शिकायतकर्ताओं से अशिष्टता से बात कर रहे थे। थाने का यह वातावरण देखकर महिला और उसके माता-पिता कांपने लगे। वे बिना शिकायत दर्ज कराए थाने से चले गए। ऐसे कितने ही उदाहरण हमारे सामने हैं।

मैंने बचपन में पिता की कुछ चिटि्ठयां उनकी संदूक में देख ली थीं। उन्हें पढ़ा भी था। लेकिन कभी उनका उल्लेख किसी से नहीं किया। आज पहली बार कर रहा हूं। अब पिता शारीरिक रूप से हमेशा-हमेशा के लिए दूर जा चुके है। लेकिन उनकी खामोशी पर चमकते उनके विचार आज भी ताजा हैं। चिटि्ठयां वक्त की आपाधापी में गुम हो गईं। ये चिटि्ठयां तत्कालीन पुलिस अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक को लिखी गई थीं। पांच-पांच पेज की इन चिटि्ठयों में कार्यालयीन और सामाजिक जीवन की प्रताड़नाओं की कितनी ही गुहार थीं। लेकिन कहीं सुनवाई नहीं।

तो इस देश और समाज को बनाने वाले लोग कौन थे, कौन हैं, कौन रहेंगे? राजनेता, नौकरशाह, बाबू, पुलिस, पत्रकार, जज, व्यापारी, उद्योगपति, विभिन पेशेवर लोग या आम आदमी? लोकतंत्र में आम आदमी के वोट की कीमत सबसे ज्यादा मानी जाती है।

पिता के बार-बार के तबादलों के कारण हमारा निर्वाचन क्षेत्र भी बदलता गया। हमारा परिवार नौ साल में तीन बार नए निर्वाचन क्षेत्र की सूची में अपना नाम शामिल कराने का आवेदन कर चुका है। लेकिन यहां भी सुनवाई नहीं। नाम नहीं आया। अधिकारियों के पास गोलमोल जवाब। अब अगर इस काम के लिए भी रिश्वत देनी पड़ी तो क्या वोट न देना ही बेहतर है? वह भी तब जब इस देश में एक-एक व्यक्ति तीन-तीन वोटर कार्ड लेकर घूम रहा हो।

– आज (28 सितंबर) भगत सिंह की जयंती है। करीब 114 साल पहले जन्मे इस महापुरुष और मेरे बीच कहीं न कहीं भावनाओं का एक अटूट रिश्ता होगा ही। इसलिए जब मैंने यह लेख लिखना शुरू किया, तब सुबह के 4 बज रहे थे। इसके पहले करीब दो घंटे तक नींद नहीं आई। मंथन चल रहा था। ऐसा अक्सर हो जाता है। कई कविताएं इसी पहर में लिखी हैं। इन दिनों भगत सिंह की एक किताब पर काम कर रहा हूं। इसलिए कुछ संयोग भी हो सकता है।

बहरहाल, भगत सिंह ने युवाओं के लिए ‘साप्ताहिक मतवाला’ के 16 मई, 1925 के अंक में लिखा था-

” संसार के इतिहासों के पन्ने खोलकर देख लो, युवकों के रक्त से लिखे अमर संदेश भरे पड़े हैं। संसार की क्रांतियों और परिवर्तनों के वर्णन छांट डालो, उनमें केवल ऐसे युवक ही मिलेंगे, जिन्हें बुद्धिमानों ने ‘पागल छोकड़े’ अथवा ‘पथ-भ्रष्ट’ कहा है। पर जो सिड़ी हैं, वे क्या खाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान से उन्मत्त होकर अपने लोथों से किले की खाइयों को पाट देने वाले जापानी युवक किस फौलाद के टुकड़े थे।

अमेरिका के युवक-दल के नेता पैट्रिक हेनरी ने कहा था, ‘जेल की दीवारों से बाहर की जिंदगी बड़ी महंगी है, पर जेल की काल-कोठरियों की जिंदगी और भी महंगी है, क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य के रूप में चुकाई जाती है।’ अमेरिका के युवक विश्वास करते हैं कि जन्मसिद्ध अधिकारों को पद-दलित करने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है।

ऐ, भारतीय युवक! तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है! उठ, आंखें खोल, देख, प्राची दिशा का ललाट सिंदूर रंजित हो उठा। अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह। कापुरुषता के क्रोड़ में क्यों सोता है? माया, मोह,ममता त्यागकर गरज उठ।

तेरी माता, तेरी प्रातः स्मरणीया, तेरी परम वंदनीया, तेरी जगदंबा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सहवाहिनी, तेरी शस्यश्यामलांचला आज फूट-फूटकर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती? धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर! तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपुंसत्व पर! यदि अब भी तेरे किसी अंग में टुक हया बाकी हो, तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उपकार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक-एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कंठ से वंदेमातरम…।”

आप सभी को ‘समाचार प्रहरी’ की ओर से भगत सिंह जयंती की असीम शुभकामनाएं।

जय हिंद !!!


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