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लापरवाह ‘महायुति’ सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार- न्याय प्रक्रिया का बुरा हाल!

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649 आपराधिक केस वर्षों से लटके, पुलिस आरोप तय करने में विफल

✍🏻 डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | महाराष्ट्र में न्याय व्यवस्था की रफ्तार पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई है। राज्य में 649 आपराधिक मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद अब तक आरोप तय नहीं हो सके हैं। कुछ मामलों में तो पुलिस ने वर्ष 2006 में ही चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन मुकदमे की सुनवाई अब तक शुरू नहीं हुई। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए कहा, “यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।”

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने मुंबई हाई कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा दायर हलफनामे का अध्ययन करने के बाद कहा कि राज्यभर में बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी वर्षों से जेल में बंद हैं। कई मामलों में चार साल से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी मुकदमे की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी हिरासत बिना मुकदमे के चलना “न्याय का अपमान” है।

यह मामला पिंपरी-चिंचवड़ के शुभम गणपति उर्फ गणेश राठौड़ से जुड़ा है, जिसे अप्रैल 2021 में गिरफ्तार किया गया था। जुलाई 2021 में चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद सुनवाई शुरू नहीं हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने मुंबई हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि ऐसे सभी मामलों की विस्तृत जांच की जाए, जिनमें चार वर्ष या उससे अधिक पुरानी चार्जशीट लंबित हैं।

रजिस्ट्रार जनरल के हलफनामे में खुलासा हुआ कि आरोप तय करने में देरी के कारणों में अभियुक्तों की अनुपस्थिति, वकीलों का न आना, और आरोपों पर हस्ताक्षर से इनकार जैसी वजहें शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने यह भी पूछा कि क्या विचाराधीन कैदियों की अनिवार्य भौतिक या वर्चुअल पेशी संबंधी निर्देशों का पालन राज्यभर में वास्तव में हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:

“राज्य की निष्क्रियता न्याय की प्रक्रिया को अपमानित कर रही है। चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी कार्रवाई न होना शासन की गंभीर विफलता है।”


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