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काले धन की गोद में लोकतंत्र: पांच साल में 5,700 करोड़ का ‘पवित्र’ चंदा, भाजपा सबसे आगे

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कॉर्पोरेट बनी नई गाय, चुनावी बॉन्ड बना उसका दूध, और पारदर्शिता अब ‘लापता’ हुई

विशेष रिपोर्ट

✍🏻 प्रहरी डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली | बिहार में चुनाव होने वाले हैं और चुनाव का मौसम आते ही चर्चा का केंद्र पैसा बन जाता है। राजनीतिक पार्टियों के पास करोड़ों का फंड कहां से आता है और वह टैक्स के दायरे में कैसे आता है, यह सवाल अक्सर उठता है। दरअसल, राजनीतिक पार्टियों के पास आने वाला पैसा कई बार ब्लैक मनी होता है, जिसे चंदे और कानूनी प्रावधानों के जरिए व्हाइट बना दिया जाता है।

भारत का लोकतंत्र अब चुनावी मंचों से ज़्यादा बैलेंस शीटों पर चमकता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वित्तीय वर्षों (2019-20 से 2023-24) में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को 5,700 करोड़ रुपये से अधिक का घोषित चंदा मिला है। इस फंडिंग रेस में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सबको पीछे छोड़ दिया है। भाजपा ने अकेले 4,840 करोड़ रुपये की दानराशि समेटी है, जबकि कांग्रेस (आईएनसी) लगभग 670 करोड़ रुपये के चंदे के साथ काफी पीछे छूट गई।

2023-24 में चंदे की बरसात

बीते वित्तीय वर्ष में तो सत्ताधारी पार्टी के खातों में नोटों की बाढ़ आ गई। कुल 2,544 करोड़ रुपये का दान दर्ज हुआ, जिसमें से 2,243 करोड़ रुपये सिर्फ भाजपा के खाते में गए। वर्ष 2020-21 के कोविड काल में यह रकम घटकर 593 करोड़ रुपये रह गई थी, पर सत्ता का मौसम खुला तो फिर फंडिंग का सूरज चमक उठा।

कहां से आया यह पैसा?

एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक चंदे का सबसे बड़ा स्रोत कॉर्पोरेट समूह, उद्योगपति और राजनीतिक ट्रस्ट हैं। वर्ष 2016 से 2022 के बीच 9,188 करोड़ रुपये सिर्फ चुनावी बॉन्ड्स के ज़रिए आए। इनमें भी सबसे बड़ा हिस्सा भाजपा के खाते में गया। यह वही व्यवस्था है, जिसमें दानदाता का नाम गुमनाम रहता है, यानी पैसा भी पहुंचता है, पहचान भी नहीं खुलती।

कैसे व्हाइट होती है ब्लैक मनी
  • आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत राजनीतिक दलों को कर में छूट है।
  • अगर वे तय नियमों के तहत दान लेते हैं और लेखा-जोखा जमा करते हैं, तो कोई टैक्स नहीं देना पड़ता।
  • यही ‘कानूनी दरवाज़ा’ ब्लैक मनी को सफेद करने का सबसे आसान रास्ता बन गया है।
  • पार्टी चाहे तो 19,999 रुपये तक नकद दान दिखाकर दानदाता का नाम छिपा सकती है।
  • बस, बड़े नोटों को छोटे हिस्सों में तोड़िए, रिपोर्ट में दर्ज कीजिए, और देखिए, काला धन ‘व्हाइट एंड वेलकम’ हो जाता है।

कानून, पारदर्शिता और सियासतः

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि पारदर्शिता की रफ्तार उलटी दिशा में दौड़ रही है।

  • कई दानों का स्रोत स्पष्ट नहीं, कई रिपोर्ट अधूरी हैं।
  • शेल कंपनियों, ट्रस्ट और नकद लेन-देन के जरिए चंदा ‘कागज़ पर वैध’ बन जाता है।
  • जनता पूछती रह जाती है, “ये पैसा किसका है?”
  • और जवाब आता है, “राष्ट्रहित में गुप्त रखा गया है।”

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