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अदानी समूह पर एलआईसी का 3.9 अरब डॉलर निवेश विवाद: वॉशिंगटन पोस्ट रिपोर्ट में खुलासे

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  • भारत सरकार का अदानी बेलआउट पर घमासान, एलआईसी ने निभाई अहम भूमिका

  • कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने उठाए सवाल, कहा – जनता के पैसे का दुरुपयोग?

✍🏻 डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली | वॉशिंगटन पोस्ट ने शनिवार सवेरे प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि भारतीय कारोबारी गौतम अदानी के समूह पर बढ़ते कर्ज़ का बोझ अमेरिका और यूरोप के कई बैंकों के लिए चिंता का विषय बन गया था, और कई वित्तीय संस्थान उन्हें पैसा देने में हिचकिचा रहे थे। इसी बीच, भारत सरकार ने अदानी समूह की मदद के लिए एक रणनीति बनाई, जिसके तहत सरकारी स्वामित्व वाली एलआईसी ने इस साल मई में अदानी ग्रुप में लगभग 3.9 अरब डॉलर का निवेश किया।

अख़बार के मुताबिक़, आंतरिक दस्तावेज़ों में यह योजना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एलआईसी को वित्तीय दृष्टि से भरोसेमंद और ग्रामीण इलाक़ों में परिवारों की बीमा और वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने वाली संस्था माना जाता है। रिपोर्ट में बताया गया कि मई महीने में अदानी पोर्ट्स ने मौजूदा क़र्ज़ को रीफ़ाइनेंस करने के लिए बॉन्ड जारी कर 58.5 करोड़ डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा था, जिसे एलआईसी ने एक ही निवेशक के रूप में पूरा किया।

वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि यह कदम सरकारी अधिकारियों की बड़ी योजना का केवल एक हिस्सा था और इसके माध्यम से सरकार में अदानी समूह के प्रभाव की झलक मिलती है। अख़बार ने एलआईसी और वित्त मंत्रालय के फ़ाइनैंशियल सर्विसेस विभाग (डीएफ़एस) से प्राप्त दस्तावेज़ों और कई मौजूदा व पूर्व अधिकारियों व बैंकरों के इंटरव्यू के आधार पर रिपोर्ट तैयार की।

रिपोर्ट में कहा गया कि डीएफ़एस के अधिकारियों ने एलआईसी और नीति आयोग के साथ मिलकर योजना बनाई थी, जिसमें वित्त मंत्रालय ने सलाह दी कि एलआईसी अदानी समूह के 3.5 अरब डॉलर मूल्य के कॉर्पोरेट बॉन्ड खरीदे और लगभग 50.7 करोड़ डॉलर का इस्तेमाल उनकी कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए करे।

विपक्षी कांग्रेस ने एलआईसी द्वारा अदानी समूह में निवेश को ’33 हज़ार करोड़ रुपये के सार्वजनिक पैसों का दुरुपयोग’ बताया। पार्टी ने जेपीसी और संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) से जांच की मांग की है। जयराम रमेश ने पूछा कि वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के अधिकारियों ने किस दबाव में यह फैसला लिया, जबकि एलआईसी पहले ही अदानी में अरबों का निवेश कर नुकसान झेल चुका था।

तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा ने भी मोदी सरकार पर अदानी समूह को लगातार फंड देने का आरोप लगाया। पत्रकार सागरिका घोष ने सवाल उठाया कि क्या एलआईसी में जनता का पैसा सुरक्षित रहा या सिर्फ़ निजी हितों के लिए इस्तेमाल हुआ।

गौरतलब है कि अदानी समूह पर पहले भी अमेरिका की डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस और यूएस एसईसी ने धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में भी दावा किया गया कि अदानी ने 2020 से अपने सात लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में हेर-फेर कर 100 अरब डॉलर कमाए। इस दौरान कीनिया की सरकार ने समूह के साथ समझौते रद्द किए और भारत की नियामक संस्था सेबी ने हिंडनबर्ग को नोटिस जारी किया।

यह मामला अदानी समूह की वित्तीय गतिविधियों और सरकार के हस्तक्षेप पर बढ़ती आलोचनाओं के बीच सामने आया है, और राजनीतिक खेमों में गरमागरम बहस छेड़ दी है।


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