50 करोड़ एंड्रॉयड फोन, 2.5 करोड़ सरकारी लैपटॉप और अहम डेटा पर ‘सिलिकॉन वैली’ का नियंत्रण
✍🏻 प्रहरी संवाददाता, मुंबई | भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था जिस रफ्तार से आगे बढ़ी है, उसकी बुनियाद में अमेरिकी टेक कंपनियों की गहरी मौजूदगी है। देश के 50 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन गूगल के एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर चलते हैं। लगभग 2.5 करोड़ सरकारी लैपटॉप माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज सिस्टम से संचालित हैं। केंद्र और राज्यों के कई विभागों का डेटा अमेजन की एडब्ल्यूएस और माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर जैसे क्लाउड नेटवर्क में संग्रहित है।
डिजिटल संप्रभुता के इस दौर में, जहां तकनीकी आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय शक्ति का पैमाना बन चुकी है, ऐसी स्थिति में यदि अमेरिका-भारत संबंधों में गंभीर कूटनीतिक टकराव होता है और तकनीकी सेवाओं, सॉफ्टवेयर अपडेट या क्लाउड एक्सेस पर रोक लगती है, तो इसका सीधा असर देश की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। डिजिटल भुगतान प्रणाली, जीएसटी व आयकर फाइलिंग नेटवर्क, बैंकिंग सर्वर, शेयर बाजार ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म, एयरलाइन और रेलवे आरक्षण प्रणाली सहित सभी ऑनलाइन सेवाओं के संचालन क्लाउड और ऑपरेटिंग सिस्टम पर निर्भर हैं।
1997 के समझौते का प्रभाव
भारत की इस निर्भरता की जड़ें 1997 के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते में खोजी जा सकती हैं। क्लिंटन प्रशासन के दौरान हुए इस समझौते के तहत भारत ने सॉफ्टवेयर सेवाओं और आउटसोर्सिंग पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि हार्डवेयर निर्माण का नियंत्रण चीन और ताइवान जैसे देशों के पास चला गया। हालांकि इससे भारत “सॉफ्टवेयर सुपरपावर” बना, लेकिन मूलभूत तकनीकी ढांचे (कोर इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि प्रमुख क्लाउड और सॉफ्टवेयर सेवाएं बाधित होती हैं, तो प्रतिदिन हजारों करोड़ रुपये के डिजिटल लेनदेन प्रभावित हो सकते हैं। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का आकार 1 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जबकि आईटी-बीपीएम सेक्टर स्वयं लगभग 283 अरब डॉलर का है। किसी बड़े डिजिटल व्यवधान की स्थिति में जीडीपी का 2-3 प्रतिशत तक अस्थायी झटका लग सकता है, जो अनुमानित तौर पर लाखों करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान में बदल सकता है। निर्यात आधारित आईटी सेवाओं में रुकावट से विदेशी मुद्रा आय पर भी असर पड़ेगा।
इन्फोसिस और टीसीएस जैसी कंपनियां अपनी आधी से अधिक कमाई अमेरिकी बाजार से अर्जित करती हैं। देशभर में फैले ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अनुसंधान और उत्पाद विकास का कार्य करते हैं, लेकिन पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार विदेशी मुख्यालयों के पास रहते हैं।
यदि हुवावे की तरह किसी देश या कंपनी पर तकनीकी प्रतिबंध का उदाहरण दोहराया जाता है, तो भारतीय स्टार्टअप और एंटरप्राइज सेक्टर पर तात्कालिक दबाव बढ़ सकता है। एआई क्षेत्र में उन्नत चिप्स के लिए एनवीडिया और मॉडल एक्सेस के लिए ओपेनएआई पर निर्भरता भी जोखिम बढ़ाती है।
हालांकि, भारत ने अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए कुछ हद तक वैकल्पिक ढांचा विकसित किया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संचालित यूपीआई जैसे प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर लेनदेन संभालते हैं। फिर भी ऑपरेटिंग सिस्टम, क्लाउड और सेमीकंडक्टर आपूर्ति में विदेशी नियंत्रण बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में भारत का कॉर्पोरेट आरएंडडी (R&D) खर्च जीडीपी का 0.7% है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। किसी भी बड़े डिजिटल अवरोध की स्थिति में प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आर्थिक झटके, रोजगार संकट और बाजार अस्थिरता के रूप में सामने आ सकता है। भारत की डिजिटल संरचना अब अर्थव्यवस्था की केंद्रीय धुरी बन चुकी है, और इसी कारण संभावित जोखिम का दायरा भी उतना ही व्यापक माना जा रहा है।
