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सिर्फ़ 10 साल में 12 लाख करोड़ का कर्ज़ बट्टे खाते में: सरकार ने संसद में दी जानकारी

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✍🏻 प्रहरी संवाददाता, नई दिल्ली। सरकार ने राज्यसभा में खुलासा किया है कि पिछले एक दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 12.09 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ को “बट्टे खाते” में डाल दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि बैंक इन ऋणों को अब अपनी बैलेंस शीट से हटा चुके हैं, और इन्हें वसूलने की संभावनाएं बेहद सीमित मानी जा रही हैं।

पिछले पांच साल में 5.82 लाख करोड़ का कर्ज बट्टे खाते में गए

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में यह जानकारी देते हुए बताया कि वित्त वर्ष 2014-15 से 2023-24 के बीच यह आंकड़ा दर्ज किया गया है। केवल बीते पांच वर्षों के दौरान ही बट्टे खाते में डाले गए कर्ज़ की राशि 5.82 लाख करोड़ रुपये है।

इन सरकारी बैंकों ने लोन किया राइट ऑफ

इस अवधि में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) सबसे आगे रहा, जिसने अकेले 1.14 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ को राइट ऑफ किया। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने 85,540 करोड़ रुपये और पंजाब नेशनल बैंक ने 81,243 करोड़ रुपये के ऋण को अपनी बैलेंस शीट से हटाया है। बैंक इसे एक लेखांकन प्रक्रिया बताते हैं, लेकिन इसकी आलोचना लगातार हो रही है क्योंकि इससे ऋण वसूली की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।

सरकार का यह भी कहना है कि राइट ऑफ करने का मतलब यह नहीं है कि बकाया राशि माफ़ कर दी गई है। बैंकों द्वारा ऋण वसूली की प्रक्रिया दीवानी मुकदमों, ऋण वसूली अधिकरणों (DRT), और दिवालिया प्रक्रिया जैसे माध्यमों से जारी रहती है।

1,629 लोगों ने हजम किए 1.63 लाख करोड़ रुपये

एक और अहम जानकारी यह सामने आई है कि 1,629 उधारकर्ताओं को जानबूझकर कर्ज़ न लौटाने वाला (विलफुल डिफॉल्टर) घोषित किया गया है। इन पर कुल 1.63 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। ऐसे डिफॉल्टरों को आगे बैंकिंग सुविधाएं, कैपिटल मार्केट एक्सेस और अन्य वित्तीय लाभों से वंचित किया गया है।

बैंकिंग प्रणाली की पारदर्शिता और कर्ज वसूली तंत्र पर बहस तेज

वित्त मंत्रालय के इस आंकड़े के सामने आने के बाद देश की बैंकिंग प्रणाली की पारदर्शिता, ऋण नीति और कर्ज वसूली तंत्र पर बहस तेज हो गई है। खासकर तब, जब एक तरफ बड़े कर्जदारों के लिए राइट ऑफ की सुविधा उपलब्ध है और दूसरी तरफ आम आदमी को मामूली कर्ज़ न चुकाने पर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। संसद में भी यह मुद्दा विपक्षी दलों द्वारा उठाया गया, जिन्होंने आरोप लगाया कि यह व्यवस्था “उद्योगपतियों के लिए रियायत और आम लोगों के लिए सख्ती” की मिसाल बनती जा रही है।

 


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