संसदीय बहस पर सवाल: नौ विधेयक बिना चर्चा पारित
बिना बहस पारित विधेयकों ने बढ़ाई संसद की कार्यप्रणाली पर चिंता
✍️ प्रहरी विशेष संवाददाता, नई दिल्ली | देश की संसद में जनहित और नीतिगत कानूनों पर होने वाली बहस का दायरा सिमटकर महज रस्म अदायगी बनकर रह गया है। साल 2024 में किसी विधेयक पर चर्चा का जो औसत समय 5 घंटे 56 मिनट था, वह 2025 में घटकर 3 घंटे 52 मिनट और 2026 के बजट व मानसून सत्रों में गिरकर महज 2 घंटे 20 मिनट पर आ टिका है।
मौजूदा 19 दिवसीय मानसून सत्र के दौरान हंगामे और गतिरोध के बीच लोकसभा अपनी तय अवधि का केवल 15 प्रतिशत और राज्यसभा महज 33 प्रतिशत ही काम कर सकी। दोनों सदनों को 35 से अधिक बार स्थगित किया गया और अधिकांश दिन लोकसभा एक घंटे से ज्यादा नहीं चल पाई। इसी भारी हंगामे और अव्यवस्था की आड़ में सरकार ने धड़ाधड़ 11 विधेयक पारित करा लिए, जिनमें से 9 विधेयकों पर संबंधित केंद्रीय मंत्री के अलावा लोकसभा का एक भी सांसद चर्चा में शामिल नहीं हुआ।
देश के करोड़ों छोटे कारोबारियों और रोजगार की रीढ़ माने जाने वाले ‘एमएसएमई विकास (संशोधन) विधेयक 2026’ को लोकसभा में महज 3 मिनट में पारित कर दिया गया, जबकि राज्यों की खनिज संपदा पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ाने वाले ‘खान और खनिज संशोधन विधेयक 2026’ को लोकसभा में मात्र 5 मिनट की खानापूर्ति के साथ पास करा लिया गया।
अठारहवीं लोकसभा के पहले सत्र से लेकर 2026 के मानसून सत्र तक पारित किए गए 46 विधेयकों के आधिकारिक विश्लेषण से संसदीय विमर्श के पतन की भयावह तस्वीर सामने आई है। इन 46 में से 29 विधेयक ऐसे रहे जिन्हें किसी न किसी सदन में एक घंटे से भी कम समय में बिना किसी गंभीर विचार-विमर्श के पास कर दिया गया। इनमें से 18 विधेयक लोकसभा में और 11 राज्यसभा में बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के ध्वनिमत से निपटा दिए गए।
इसी तरह, जन्म और मृत्यु पंजीकरण से जुड़े महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों को मिलाकर केवल 54 मिनट चर्चा हुई। विधायी प्रक्रिया की गति इतनी तेज कर दी गई कि जनसरोकारों और व्यापक आर्थिक प्रभावों वाले कानूनों की बारीक समीक्षा को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
संसदीय परंपराओं में विधेयकों की सूक्ष्म जांच के सबसे मजबूत तंत्र यानी संसदीय स्थायी समितियों (स्टैंडिंग कमेटियों) की भूमिका को भी लगभग निष्प्रभावी कर दिया गया है। 2026 के मानसून सत्र में पारित किसी भी नए विधेयक को विस्तृत जांच के लिए स्थायी समिति के पास नहीं भेजा गया। 17वीं लोकसभा के पूरे कार्यकाल में जहां कुल 179 विधेयकों में से मात्र 16 प्रतिशत ही समितियों के पास भेजे गए थे, वहीं 18वीं लोकसभा में यह आंकड़ा और भी निचले स्तर पर पहुंच गया है।
जहां विपक्ष इसे सदन में बिना जवाबदेही के कानून थोपने और विधायी समीक्षा को कुचलने का आरोप बता रहा है, वहीं विधायी विशेषज्ञों का कहना है कि संख्याबल के दम पर बिना बहस चंद मिनटों में बिल पास कराने की यह परिपाटी संसद को कानून निर्माण के लोकतांत्रिक मंच के बजाय केवल सरकारी मुहर लगाने वाले दफ्तर में तब्दील कर रही है।
