भारतीय विदेश नीति अब गलियारों की कूटनीति से निकलकर चुनावी मंचों की ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बन गई है। वाजपेयी से लेकर मोदी तक, भाजपा सरकारों ने ‘राष्ट्रीय गौरव’ का जो गुब्बारा फुलाया, उसकी हवा अक्सर पड़ोसी मुल्कों की सुइयों ने निकाल दी।
2001 में जब संसद की दहलीज पर हमला हुआ, तब दिल्ली की सत्ता ने ‘आर-पार’ की हुंकार भरी थी। ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के नाम पर करोड़ों का सरकारी खजाना फूंक दिया गया, फौजें महीनों सरहद पर धूल फांकती रहीं, लेकिन नतीजा?
वाशिंगटन से एक फोन आया और हमारी ‘मजबूत इच्छाशक्ति’ ने यू-टर्न ले लिया। वह हार सेना की नहीं, उस कूटनीति की थी जो दुनिया को यह समझाने में नाकाम रही कि भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी का मोहताज नहीं है।
आज के ‘न्यू इंडिया’ में भी हमारी कूटनीति ‘हग-डिप्लोमेसी’ और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की शिकार है। बालाकोट में बम तो गिरे, लेकिन उनसे निकलने वाले धुएं ने दावों और हकीकत के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। अगर वह स्ट्राइक इतनी ही निर्णायक थी, तो आज भी कश्मीर में लक्षित हत्याएं (Targeted Killings) क्यों जारी हैं?
उधर, लद्दाख में चीन हमारी जमीन पर पुल बना रहा है और हम ‘लाल आंख’ दिखाने के बजाय व्यापार के नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। यह कैसी विदेश नीति है जहां राष्ट्रवाद का शोर तो है, पर रणनीतिक स्वायत्तता की खामोशी डराती है?
राजनीति में ‘इमेज’ का अपना महत्व है, लेकिन विदेश नीति ‘इमेज’ से नहीं ‘इम्पैक्ट’ (प्रभाव) से मापी जाती है। वाजपेयी जी के समय हम बस लेकर लाहौर गए, तो बदले में कारगिल मिला। मोदी के दौर में हमने ‘लाल आंखें’ दिखाईं, तो जवाब में गलवान और पैंगोंग में चीनी बंकर मिले।
विडंबना देखिए, जिस संसद हमले के बाद हमने ‘आर-पार’ की कसम खाई थी, आज उसी संसद में विपक्षी सदस्य जब चीन या सीमा सुरक्षा पर सवाल पूछते हैं, तो जवाब ‘डिप्लोमैटिक चुप्पी’ में मिलता है। क्या ‘विश्वगुरु’ बनने का रास्ता अपने ही पड़ोस में प्रभाव खोकर और सीमा पर यथास्थिति (Status Quo) को उपलब्धि मानकर तय होगा?
