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2026 का ‘फंडिंग वॉर’: बॉन्ड के बाद इलेक्टोरल ट्रस्ट बना कॉरपोरेट का ‘पावर रूट’, भाजपा की झोली में 82% हिस्सा

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चुनावी बॉन्ड से भाजपा के पास ₹6,900 करोड़ से अधिक का बैंक बैलेंस

✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुमनाम इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को रद्द किए जाने के बाद भले ही इलेक्टोरल बॉन्ड इतिहास बन गए हों, लेकिन कॉरपोरेट चंदे की रफ़्तार कम होने के बजाय और तेज हो गई है। वित्त वर्ष 2024-25 के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि चुनावी चंदे के लिए अब ‘इलेक्टोरल ट्रस्ट’ नया डिफॉल्ट विकल्प बन चुके हैं। 2026 के ‘मिनी आम चुनाव’ (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम सहित 5 राज्य) से पहले, ट्रस्टों के जरिए होने वाला चंदा 300% उछलकर ₹3,811 करोड़ के पार निकल गया है।

बीजेपी सबसे बड़ी लाभार्थी

राजनीतिक चंदे का यह समुद्र एक ही दिशा में बहता दिख रहा है। इस भारी-भरकम राशि का 82% अकेले भाजपा के खाते में गया है, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस महज 8% पर सिमट गई है।

पॉवर प्ले: 98% फंड पर सिर्फ 3 ट्रस्टों का कब्जा

देश में 19 पंजीकृत ट्रस्टों के बावजूद, चंदे का असली खेल सिर्फ तीन दिग्गजों के इर्द-गिर्द सिमटा है। वित्त वर्ष 2025 में हुए कुल कार्पोरेट बॉन्ड के चंदे का वितरण का 98% इन्हीं के जरिए हुआ।
प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट: ₹2,668 करोड़ के साथ सबसे बड़ा खिलाड़ी। इसमें L&T (एलेवेटेड रियल्टी के जरिए ₹500 करोड़) और जिंदल स्टील जैसे दिग्गजों का पैसा लगा है। भाजपा को इससे ₹2,181 करोड़ मिले।

प्रोग्रेसिव ट्रस्ट (टाटा समूह): ₹915 करोड़ का संग्रह और वितरण; यहाँ भी भाजपा शीर्ष लाभार्थी रही।

न्यू डेमोक्रेटिक ट्रस्ट (महिंद्रा समूह): ₹160 करोड़ बांटे, जिसमें से ₹150 करोड़ सत्ताधारी दल को गए।

‘एनॉनिमिटी-लाइट’, क्यों भा रहा है यह रास्ता?

पॉलिटिकल डेस्क के विश्लेषण के अनुसार, कॉरपोरेट्स ने ट्रस्ट को इसलिए चुना क्योंकि यह बॉन्ड जैसी ‘पूरी गुमनामी’ तो नहीं, पर ‘धुंधली पारदर्शिता’ जरूर देता है।

पर्दे के पीछे का लिंक: रिपोर्ट में यह तो दर्ज होता है कि किस कंपनी ने ट्रस्ट को कितना दिया, लेकिन यह लिंक गायब रहता है कि उस कंपनी का पैसा अंततः किस पार्टी के पास गया।

टैक्स का तड़का: धारा 80GGB के तहत 100% टैक्स छूट और चुनाव से ठीक पहले 95% फंड बांटने की बाध्यता इसे ‘कैश-पाइपलाइन’ बनाती है।

2026 की सियासी जंग: संसाधनों की भारी खाई

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों और राज्यसभा की 75 सीटों के संग्राम से पहले यह आर्थिक बढ़त निर्णायक साबित हो सकती है।

जहां भाजपा ₹6,900 करोड़ से अधिक के बैंक बैलेंस के साथ ‘चुनावी मशीन’ की तरह तैयार है, वहीं कांग्रेस (₹539 करोड़ कुल फंडिंग) के लिए संसाधनों का यह अंतर किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी ने हाल ही में विदेशी धरती से इसे ‘एजेंसियों का दबाव’ करार देकर हमले और तेज कर दिए हैं।

उल्लेखनीय है कि फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि पूर्ण गुमनामी मतदाताओं के सूचना के अधिकार के खिलाफ है। बॉन्ड हटने के बाद इलेक्टोरल ट्रस्टों में आई यह तेजी 2026 के चुनावी परिदृश्य से पहले राजनीतिक फंडिंग की बदली हुई तस्वीर को रेखांकित करती है।


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