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जब परदे के पीछे मिले भारत–इज़रायल, और इंदिरा गांधी ने बना दिया चुनावी मुद्दा

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जब चुपचाप दिल्ली पहुंचे इज़रायली विदेश मंत्री, वाजपेयी से मुलाक़ात पर मचा सियासी बवाल

✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इज़रायल दौरे के बीच भारत–इज़रायल रिश्तों का एक पुराना अध्याय फिर चर्चा में है। 2017 में नरेंद्र मोदी इज़रायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि दोनों देशों ने पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित किए, लेकिन उससे पहले भी परदे के पीछे संपर्क जारी रहे। इन्हीं में से एक था 1978 का वह गोपनीय दौरा।

जनता पार्टी सरकार के समय इज़रायल के तत्कालीन विदेश मंत्री मोशे दयान चुपचाप नई दिल्ली पहुंचे। उस समय विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी अटल बिहारी वाजपेयी के पास थी और प्रधानमंत्री थे मोरारजी देसाई। दक्षिण ब्लॉक में दोनों नेताओं के बीच बैठक हुई। इस दौरे की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई और न ही विस्तृत एजेंडा सार्वजनिक किया गया।

भारत ने 1950 में इज़रायल को मान्यता दी थी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए थे। उस दौर में भारत की विदेश नीति अरब देशों और फ़िलिस्तीन के समर्थन पर आधारित थी। ऐसे में इज़रायली विदेश मंत्री का यह दौरा कूटनीतिक रूप से संवेदनशील माना गया।

दयान की यात्रा की जानकारी सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई। कांग्रेस और वाम दलों ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। 1980 के आम चुनाव से पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस मुद्दे को सार्वजनिक सभाओं में उठाया। उनके कार्यकाल में भारत ने फ़िलिस्तीनी नेता यासिर अराफात और पीएलओ के साथ खुला समर्थन जताया था।

सरकार की ओर से इस संपर्क को नियमित कूटनीतिक संवाद का हिस्सा बताया गया, जबकि विपक्ष ने इसे विदेश नीति में बदलाव का संकेत कहा। हालांकि तत्काल कोई औपचारिक नीति परिवर्तन घोषित नहीं हुआ।

करीब 14 साल बाद, जनवरी 1992 में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव की सरकार ने इज़रायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। उसी वर्ष इज़रायली विदेश मंत्री शिमोन पेरेस की भारत यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को औपचारिक रूप दिया। 1978 की यह गोपनीय मुलाक़ात भारत–इज़रायल संबंधों के इतिहास में एक अहम लेकिन लंबे समय तक परदे में रहा अध्याय मानी जाती है।


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