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बैंकिंग सिस्टम से ₹6.7 लाख करोड़ की नकदी बाहर, कर्ज महंगा होने का दबाव बढ़ा

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  • RBI की नकदी खींचतान से कर्ज महंगा होने की आहट

  • रिकॉर्ड ₹11.16 लाख करोड़ से सरप्लस लिक्विडिटी घटकर ₹4.45 लाख करोड़

  • OMO और VRRR से RBI का लगातार नकदी अवशोषण, मनी मार्केट दरें रेपो रेट के करीब

✍️ प्रहरी बिजनेस डेस्क, मुंबई | बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी जिस तेजी से घट रही है, उससे आने वाले समय में कर्ज की लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की बॉन्ड बिक्री और लगातार वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) कार्रवाइयों के बीच 22 सितंबर तक बैंकिंग सिस्टम की सरप्लस लिक्विडिटी घटकर करीब ₹4.45 लाख करोड़ रह गई। इससे बैंकों के पास उपलब्ध अतिरिक्त और अपेक्षाकृत सस्ती नकदी का कुशन काफी छोटा हो गया है। अगर तरलता में यह कमी बनी रहती है और बाजार में फंड जुटाने की लागत बढ़ती है, तो होम लोन, ऑटो लोन और कंपनियों के कर्ज की ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव आ सकता है।

सितंबर की शुरुआत में तस्वीर इसके ठीक उलट थी। 6 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी करीब ₹11.16 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। यानी कुछ ही हफ्तों में सरप्लस लिक्विडिटी में करीब ₹6.7 लाख करोड़ की कमी आ चुकी है। 21 सितंबर को यह स्तर ₹4.92 लाख करोड़ था, जो अगले दिन और घटकर ₹4.45 लाख करोड़ रह गया। शुरुआती उछाल की बड़ी वजह बैंकों द्वारा जुटाई गई भारी FCNR(B) जमा और उसके बाद RBI के साथ किए गए विदेशी मुद्रा स्वैप थे। महीने के अंत में सरकारी वेतन और पेंशन भुगतान ने भी सिस्टम में नकदी बढ़ाई थी।

अब RBI इस अतिरिक्त नकदी को व्यवस्थित तरीके से वापस खींच रहा है। केंद्रीय बैंक ने 17 सितंबर को ₹50,000 करोड़ और 21 सितंबर को ₹25,000 करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचे। कुल ₹1 लाख करोड़ की OMO बिक्री तीन चरणों में तय की गई है और अंतिम ₹25,000 करोड़ की बिक्री 28 सितंबर को प्रस्तावित है। OMO में बैंक और दूसरे निवेशक RBI से सरकारी प्रतिभूतियां खरीदते हैं और बदले में सिस्टम की नकदी RBI के पास चली जाती है।

इसके साथ RBI ने 23 सितंबर को ओवरनाइट VRRR के जरिए भी ₹75,026 करोड़ सोखे। इस नीलामी में ₹87,993 करोड़ की बोलियां आईं, जिनमें से ₹75,026 करोड़ स्वीकार किए गए। कट-ऑफ और वेटेड एवरेज दर 5.24% रही। इससे एक दिन पहले भी RBI ने VRRR के जरिए ₹71,971 करोड़ अवशोषित किए थे।

लिक्विडिटी घटने का असर मनी मार्केट में दिखाई देने लगा है। वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) करीब 5.24% पहुंच गया है, जबकि RBI की मौजूदा रेपो दर 5.25% है। यानी बैंकों के बीच रातोंरात धन की कीमत अब केंद्रीय बैंक की नीतिगत दर के लगभग बराबर आ गई है।

इसका मतलब यह नहीं कि अगले ही दिन होम या ऑटो लोन की EMI बढ़ जाएगी। लेकिन यदि बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी और घटती है, तो बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में नई उधारी पर ब्याज दरें ऊपर जाने का दबाव बनेगा और फ्लोटिंग रेट वाले होम, ऑटो तथा कारोबारी कर्ज की लागत भी बढ़ सकती है।

कंपनियों के लिए वर्किंग कैपिटल और नए कर्ज का खर्च बढ़ना निवेश और विस्तार की योजनाओं पर भी असर डाल सकता है।
RBI की मौजूदा कार्रवाई को सीधे रेपो रेट बढ़ोतरी नहीं माना जा सकता।

फिलहाल केंद्रीय बैंक का मकसद अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करना और ओवरनाइट मनी मार्केट रेट्स को रेपो रेट के आसपास रखना है। लेकिन यदि नकदी पर यह दबाव आगे भी जारी रहता है, तो बाजार की ब्याज दरों और भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर कर्जदारों, बैंकों और कंपनियों की लागत का समीकरण बदल सकता है।


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