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सवाल पूछना नक्सलवाद नहीं… हुजूर ए आला!

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“दिमागी नक्सल अब भी मौके की तलाश में है”- यदि किसी प्रधानमंत्री के भाषण में ऐसा वाक्य आता है, तो यह केवल राजनीतिक तंज नहीं रह जाता; यह लोकतांत्रिक भाषा की गंभीर परीक्षा बन जाता है। प्रधानमंत्री देश की पूरी जनता के प्रतिनिधि होते हैं, केवल अपने समर्थकों के नहीं। इसलिए असहमति रखने वाले नागरिकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों या विपक्षी दलों को ऐसे लेबल से पुकारना, जो उन्हें देश-विरोधी या हिंसक मानसिकता से जोड़ दे, लोकतांत्रिक मर्यादा को कमजोर करता है।

सवालों से डर कैसा?

सरकार से सवाल पूछना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। बेरोजगारी, महंगाई, सीमा-सुरक्षा, भ्रष्टाचार, संस्थाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक तनाव या सरकारी नीतियों पर सवाल उठाना लोकतंत्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की अनिवार्य प्रक्रिया है। जो शासन प्रश्नों को उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछने वालों की नीयत पर हमला करके दबाना चाहे, वह असल में अपने आत्मविश्वास की कमी उजागर करता है।

आज राजनीतिक शब्दावली में “अर्बन नक्सली”, भाजपा सरकार के कार्यकाल में पहली बार “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “देशद्रोही” और “आतंकी समर्थक” जैसे शब्द बहुत आसानी से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। समस्या यह नहीं कि देश में हिंसक उग्रवाद या आतंकवाद जैसी चुनौतियां नहीं हैं; समस्या यह है कि गंभीर आरोपों को राजनीतिक असहमति पर चिपकाकर उनकी गंभीरता ही कम कर दी जाती है। आतंकवाद कानून और सबूत का विषय है, चुनावी भाषण का विशेषण नहीं।

लेबल का राजनीतिक कारोबार

जब किसी सरकार के पास उपलब्धियों का ठोस हिसाब होता है, तो वह आंकड़ों, नीतियों और परिणामों के साथ जनता के सामने आती है। लेकिन जब विमर्श को रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से हटाकर “कौन राष्ट्रवादी है” और “कौन नक्सली है” के अंतहीन विवाद में बदल दिया जाता है, तो जनता के वास्तविक सवाल हाशिये पर चले जाते हैं।

भाजपा और आरएसएस की यही राजनीतिक रणनीति है, जिसमें असहमति को संदेहास्पद और आलोचना को षड्यंत्र बताया जाता है। सवाल पूछने वाला पहले “अर्बन नक्सली” कहलाता है, फिर “राष्ट्र-विरोधी”, और अंततः उसे सामाजिक रूप से अलग-थलग करने का अभियान शुरू हो जाता है। मानो लोकतंत्र में नागरिक का काम केवल तालियां बजाना हो- और सवाल पूछना किसी गुप्त संगठन की सदस्यता!

भाजपा और संघ का संदेश

भाजपा और संघ से जुड़े राजनीतिक नैरेटिव का एक स्पष्ट उद्देश्य दिखाई देता है: राष्ट्रवाद की परिभाषा पर एकाधिकार स्थापित करना। इस नैरेटिव में राष्ट्रभक्ति का प्रमाण सरकार के प्रति समर्थन बन जाता है, जबकि सरकार की आलोचना को राष्ट्र-विरोध की श्रेणी में धकेल दिया जाता है। यह एक सुविधाजनक राजनीति है, क्योंकि इससे शासन के प्रदर्शन पर बहस करने के बजाय आलोचक की देशभक्ति पर बहस शुरू हो जाती है।

यह भी याद रखना चाहिए कि राष्ट्र सरकार से बड़ा है और सरकार लोकतंत्र से बड़ी नहीं। किसी दल, नेता या संगठन को देश का पर्याय बना देना लोकतांत्रिक चेतना के लिए खतरनाक है। सरकार बदल सकती है, सत्ता पक्ष विपक्ष बन सकता है, लेकिन संविधान नागरिक को प्रश्न पूछने और असहमति रखने का अधिकार देता है।

प्रधानमंत्री की भाषा की जिम्मेदारी

सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता की उत्तेजक भाषा और प्रधानमंत्री की भाषा में अंतर होता है। प्रधानमंत्री के शब्दों का प्रभाव प्रशासन, पुलिस, समर्थक समूहों और व्यापक जनमत पर पड़ता है। इसलिए उन्हें यह तय करना होता है कि वे आलोचकों को प्रतिद्वंद्वी मानेंगे या शत्रु।

एक परिपक्व प्रधानमंत्री कह सकता है- “हम आपकी आलोचना से असहमत हैं, पर आपके सवाल का जवाब देंगे।” एक असुरक्षित सत्ता कहती है- “सवाल मत पूछो, वरना तुम्हें देश-विरोधी घोषित कर दिया जाएगा।” इन दोनों वाक्यों के बीच ही लोकतांत्रिक शासन और राजनीतिक प्रचार का अंतर छिपा है।

असली देशभक्ति क्या है?

देशभक्ति का अर्थ केवल झंडा लहराना, नारे लगाना या सत्ता का समर्थन करना नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है – लोकतांत्रिक मूल्यों व संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करना, कमजोर नागरिकों की आवाज़ उठाना और सत्ता से जवाबदेही की मांग करना।

अगर हर असहमति को “दिमागी नक्सल” कह दिया जाए, तो कल संसद में विपक्ष, विश्वविद्यालय में विद्यार्थी, अदालत में याचिकाकर्ता और मीडिया में आलोचक- सब किसी न किसी लेबल के शिकार हो सकते हैं। तब लोकतंत्र बचेगा जरूर, लेकिन केवल पोस्टरों और भाषणों में।

सत्ता को यह समझना होगा कि नागरिक सवाल पूछकर देश को कमजोर नहीं करते; वे सत्ता को बेहतर बनने के लिए मजबूर करते हैं। और यदि किसी प्रधानमंत्री को हर सवाल में साजिश दिखाई देने लगे, तो समस्या सवाल पूछने वालों में नहीं, सत्ता के आत्मविश्वास में खोजी जानी चाहिए।

 


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