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भारत–अमेरिका ट्रेड डील: एयरोस्पेस सेक्टर में विदेशी कंपनियों को बढ़त, भारत को राजस्व नुकसान

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  • बोइंग और एयरबस की भारत रणनीति

  • टैरिफ कटौती से घरेलू सप्लाई चेन को राहत

  • भारतीय एयरलाइंस के लिए 80 अरब डॉलर का अवसर

✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई | भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के एयरोस्पेस प्रावधानों को लेकर देश के विमानन और रक्षा उद्योग में हलचल तेज़ हो गई है। समझौते के तहत भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले एयरोस्पेस कंपोनेंट्स पर जीरो ड्यूटी का प्रावधान किया गया है, जिससे भारत को यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे स्थापित सप्लाई-चेन देशों के समान दर्जा मिला है। लेकिन इसी प्रावधान को लेकर सरकार की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस समझौते से भारत के एयरोस्पेस निर्यात में तेज़ बढ़ोतरी की उम्मीद है। वर्तमान में भारत से Airbus के लिए लगभग 1.5 अरब डॉलर और Boeing के लिए करीब 1.25 अरब डॉलर की सालाना सोर्सिंग होती है। अधिकारियों का दावा है कि बोइंग आने वाले वर्षों में भारत से अपनी खरीद दोगुनी कर सकता है और भारत उसके सबसे बड़े विदेशी कंपोनेंट सप्लायर्स में शामिल हो सकता है।

हालांकि, इस डील का दूसरा पक्ष सरकार की राजस्व हानि से जुड़ा है। एयरोस्पेस कंपोनेंट्स पर जीरो ड्यूटी लागू होने से केंद्र सरकार को कस्टम ड्यूटी के रूप में मिलने वाली बड़ी आय समाप्त हो जाएगी। सरकारी आकलन के मुताबिक, यह नुकसान हजारों करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद समझौते में घरेलू उद्योग को सुरक्षा देने या न्यूनतम वैल्यू-ऐडिशन की कोई ठोस बाध्यता स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं की गई है।

इसके साथ ही, समझौते में एयरोस्पेस उत्पादों पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे भारतीय एयरलाइंस को विमानों और स्पेयर्स की खरीद में राहत मिलेगी, लेकिन घरेलू विनिर्माण इकाइयों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। बोइंग के पास पहले से भारतीय एयरलाइंस से लगभग 50 अरब डॉलर के ऑर्डर हैं और आगे “दहाई अरब डॉलर” के नए ऑर्डर की संभावना जताई जा रही है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ‘मेक इन इंडिया’ के लिए अवसर बताया है, लेकिन उद्योग सूत्रों का कहना है कि बिना सख्त शर्तों के यह डील विदेशी कंपनियों को लाभ और भारत को सीमित उत्पादन तथा राजस्व नुकसान की स्थिति में छोड़ सकती है।

 


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