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उम्मीदवारों की कुंडली में ‘राजयोग’ जगा रहे ज्योतिषी!

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  • सियासी दंगल में सितारों की चाल में फंस रहे उम्मीदवार
  • कोई बांध रहा गंडा-डोरा, तो कोई ढूंढ रहा जीत का मुहूर्त
  • मतदाताओं से ज्यादा देवों पर भरोसा

✍🏻 प्रहरी संवाददाता मुंबई | महाराष्ट्र में महानगर पालिका चुनावों के मद्देनजर सियासी पारा चढ़ने लगा है। जहां एक ओर गठबंधन और महा-गठबंधन के बीच सीट बंटवारे की खींचतान जारी है, वहीं दूसरी ओर इच्छुक उम्मीदवारों की दौड़ सीधे मंदिरों, पंडितों-बाबाओं और ज्योतिषियों के दरवाजे तक पहुंच गई है। इन दिनों मुंबई, ठाणे, कल्याण, पुणे सहित राज्य के विभिन्न शहरों के राजनीतिक गलियारों में चर्चा केवल रणनीति की नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्रों की भी हो रही है। किसी उम्मीदवार की उंगलियों में नए रत्न चमक रहे हैं, तो किसी की कलाई पर काले, केसरिया और लाल रंग के गंडे-डोरे बंधे हुए दिखाई दे रहे हैं।

शुभ मुहूर्त और ग्रह शांति की तलाश में कैंडिडेट

नामांकन भरने का शुभ मुहूर्त कौन सा है, प्रचार कब शुरू करना चाहिए, जनसभा किस दिशा में और किस दिन आयोजित करनी चाहिए, इन सब बातों के लिए उम्मीदवार ज्योतिषियों से लंबी मंत्रणा कर रहे हैं। यहां तक कि अपनी उम्मीदवारी अंतिम सूची में टिकेगी या नहीं, इसका जवाब भी कुंडली में तलाशा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, मुंबई, ठाणे और पुणे के कई रसूखदार उम्मीदवारों ने शिर्डी, तिरुपति बालाजी और उज्जैन जैसे तीर्थ स्थलों की विशेष यात्राएं की हैं। वहां अपने नामांकन पत्रों की फोटोकॉपी भगवान के चरणों में रखकर ‘राजनीतिक सफलता’ का आशीर्वाद मांगा जा रहा है।

कर्म से ज्यादा ग्रहों पर अटूट विश्वास

जनसंपर्क और विकास कार्यों के दावों के बीच, अब पन्ना, मूंगा और नीलम जैसे महंगे रत्नों की मांग बढ़ गई है। ज्योतिषियों का कहना है कि वे कुंडली में राजयोग और विजय योग को सक्रिय करने के लिए विशेष मंत्र जाप, शांति पाठ और यज्ञ के उपाय सुझा रहे हैं। कई उम्मीदवारों ने तो नवंबर से ही गुप्त अनुष्ठान शुरू कर दिए थे। कलाई पर बंधा रक्षासूत्र और माथे पर लगी भस्म अब चुनावी गहमागहमी में उम्मीदवारों की नई पहचान बन गई है।

खान-पान पर पाबंदी और सात्विक जीवन पर जोर

दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के इस खेल में बाबाओं ने उम्मीदवारों की जीवनशैली भी बदल दी है। कट्टर मांसाहारी उम्मीदवारों को भी सख्त हिदायत दी गई है कि वे चुनाव तक केवल शाकाहार अपनाएं। जीत सुनिश्चित करने के लिए ‘सात्विक’ रहने की यह जद्दोजहद उम्मीदवारों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

चमत्कारी बदलाव से जनता हैरान

अध्यात्म के साथ-साथ उम्मीदवारों के व्यवहार में भी ‘चमत्कारी’ बदलाव आया है। जो नेता पहले आम जनता से मिलने में कतराते थे, वे अब चेहरे पर एक स्थायी मुस्कान और हाथ जोड़कर सेवा का अवसर मांगते दिख रहे हैं। माथे पर तिलक और गले में पार्टी का गमछा डाले ये नेता हर दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। जनता भी नेताओं की इस अचानक जागी ‘विनम्रता’ को देख हैरान है।
मुंबई महानगर पालिका के इस चुनावी दंगल में भी फिलहाल तो यही तस्वीर साफ दिख रही है कि उम्मीदवारों के पैर जमीन पर कम और मंदिरों की सीढ़ियों पर ज्यादा पड़ रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र के इस महापर्व में अंतिम फैसला ग्रहों की चाल नहीं, बल्कि मतदाता के विवेक का ‘बटन’ ही करेगा।


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