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भारत की GDP 8.2% बढ़ी, लेकिन मासिक आर्थिक आंकड़े क्यों दिखा रहे हैं अलग तस्वीर?

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✍🏻 प्रहरी संवाददाता, मुंबई | देश की अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार के दावों और जमीनी संकेतकों के बीच एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि औसतन 8 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) ग्रोथ 8.4 प्रतिशत बताई गई। यह आंकड़े लगातार दूसरी तिमाही अर्थशास्त्रियों के अनुमानों से कहीं ज्यादा रहे हैं। लेकिन जब इन्हें मासिक और हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा से मिलाया जाता है, तो तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिखती।

सरकारी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के मुताबिक अप्रैल से सितंबर के बीच औद्योगिक उत्पादन की औसत वृद्धि सिर्फ 3.2 प्रतिशत रही, जबकि मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में बढ़ोतरी 4.2 प्रतिशत तक सीमित रही। यही नहीं, GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है। वर्ष 2011-12 में 16.1 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2024-25 में यह 12.6 प्रतिशत रह गई है।
भारत की GDP का 55 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सर्विस सेक्टर से आता है और ऊंची ग्रोथ का बड़ा हिस्सा यहीं से दिखाया जा रहा है। लेकिन ज़मीनी संकेतक उतने उत्साहजनक नहीं हैं। अगर GDP सच में 8 प्रतिशत से ऊपर बढ़ रही होती, तो उसका असर रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन में साफ़ दिखता। ये सेक्टर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करते हैं और सीमेंट-स्टील जैसी मांग को खींचते हैं। लेकिन कई शहरों में साइट-लेवल गतिविधि सीमित है, नए प्रोजेक्ट्स की रफ्तार असमान है और हाउसिंग डिमांड में तेज़ उछाल नहीं दिखता। यही वजह है कि अर्थशास्त्री रियल एस्टेट को GDP बनाम ग्राउंड रियलिटी की बहस का अहम पैमाना मानते हैं।

अन्य हाई-फ्रीक्वेंसी संकेतक भी मजबूत GDP ग्रोथ के दावे से मेल नहीं खाते। जुलाई-सितंबर तिमाही में घरेलू हवाई यात्री संख्या सालाना आधार पर 1.8 प्रतिशत घटी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में इसमें 5.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। 2025 में हर महीने विदेशी पर्यटकों की संख्या 2024 से कम रही है। वहीं, अक्टूबर में पहले से कमजोर GST संग्रह के बाद नवंबर में इसकी वृद्धि लगभग ठहरी हुई नजर आई।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। बैंकों का कर्ज वितरण रफ्तार पकड़ रहा है और उद्योगों को दिए गए ऋण में सालाना आधार पर 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जुलाई-सितंबर तिमाही में कॉरपोरेट नतीजे भी दो साल के सर्वश्रेष्ठ स्तर पर रहे, जबकि केंद्र और राज्यों का पूंजीगत खर्च दो अंकों में बढ़ा है।

इन विरोधाभासी संकेतों के बीच फरवरी 2026 में आने वाली नई GDP सीरीज़ पर सबकी नजरें टिकी हैं, जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक सेहत की तस्वीर कुछ और साफ होने की उम्मीद है।

 


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