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कृष्ण होते तो क्या कहते? 100 रुपया तिजोरी से, क्या पेट भरेगी गैया मां…,

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“सरकार के 100 रुपये के गौसेवा अनुदान पर व्यंग्य! क्या वास्तव में यह गौ माता के लिए वरदान है या सिर्फ एक दिखावा? पढ़ें, एक चुटीला व्यंग्य जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा!”

द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण को सबसे बड़ा गौ पालक समझा जाता था, आज के दौर में उनका स्थान दूध से धुले हुए लोगों ने ले लिया है। कृष्ण भगवान अगर आज के दौर में होते, तो क्या करते? शायद गीता का ज्ञान देने के बजाय किसी गौशाला में अपनी बांसुरी बजा रहे होते, क्योंकि अब धर्म की रक्षा का मतलब सिर्फ ‘गाय माता’ का पालन-पोषण रह गया है।

महाराष्ट्र सरकार ने गौशालाओं के लिए प्रति गाय 100 रुपये का अनुदान जारी किया है। यह सुनकर लगा कि गोवर्धन पर्वत उठाने वाले कृष्ण का असली वरदान तो अब जाकर फलीभूत हुआ है! आखिर, जिस देश में भगवान कृष्ण गायों को बचाने के लिए गोवर्धन उठा सकते थे, वहाँ सरकार का 100 रुपये देना तो एकदम स्वाभाविक लगता है।

अब ज़रा सोचिए, गाय माताएं भी इस फैसले से कितनी प्रसन्न होंगी। कल तक जो चारा सूखा-सूखा सा लगता था, आज उसमें घी-शक्कर की महक आने लगी होगी।

और गौशालाओं के मालिक?

अरे भाई, उनकी तो लॉटरी लग गई!

अगर 100 गायें हों तो हर दिन 10,000 रुपये सीधे खाते में। मतलब, सालभर में 36 लाख रुपये—बिना किसी इनकम टैक्स के झंझट के! शायद यह वही ‘रामराज्य’ है जिसका वादा किया गया था, बस इसमें जनता की जगह गायें ही मुख्य नागरिक बन गई हैं।

इधर किसान, जिसकी मेहनत से कृष्ण भी हल जोतने को प्रेरित होते थे और बलराम को भी साथ में हल रखना पड़ता था, आज आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा है। सोच रहा है कि कब कोई सरकार उसकी भी सुध लेगी। उसकी फसल के दाम तो वैसे ही लुढ़क रहे हैं जैसे पुरानी साइकिल की चेन, लेकिन सरकार को उसकी परवाह कम और गाय की परवरिश की चिंता ज़्यादा है।

अब ज़रा आम जनता को देखिए। एक आदमी रोज़ 12 से 14 घंटे काम करके मुश्किल से 10-12 हजार रुपये महीना कमाता है, उसमें भी बिजली का बिल, राशन, स्कूल की फीस सब निकालने के बाद हाथ में बचता क्या है? लेकिन, ‘गाय माता’ के लिए दयावान सरकार ने ‘सम्मान राशि’ दे दी।

वाह रे नीति! कृष्ण की गीता कहती है कि कर्म करो, लेकिन सरकार कहती है कि अगर गाय हो तो बस आराम करो, सरकार तुम्हारी देखभाल कर ही लेगी।

बात सिर्फ पैसे तक ही नहीं है। अगर कहीं सड़क पर कोई बीमार इंसान तड़प रहा हो तो शायद ही कोई सरकारी अफसर आए, लेकिन अगर कोई गाय माता बीमार हो जाए, तो पूरा अमला ही सेवा में जुट जाएगा। ऐसा प्रेम तो खुद कृष्ण ने भी अपनी गायों से नहीं किया होगा!

खैर, अब देश में नई प्रतियोगिता शुरू होने वाली है—”कौन बनेगा सरकार का दुलारा?” हालांकि इसमें युवा, किसान, बेरोज़गार और मजदूर तो पहले ही हार चुके हैं। जीत का ताज सीधे ‘गाय माता’ के सिर ही सजेगा। आखिर वो केवल चारा ही नहीं, वोट बैंक भी तो जुटाती हैं!

तो भाइयों और बहनों, अगले जनम में अगर मौका मिले तो इंसान बनने की भूल मत करना। ‘कृष्ण-नीति’ के इस नए संस्करण में गाय बन जाना। न मेहनत करनी पड़ेगी, न टैक्स देना पड़ेगा, और सरकार खुद सेवा में हाजिर होगी। जय श्रीकृष्ण, जय गौ माता!


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