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क्या सरकारी बेरुखी ने बनाया एक मोटिवेशनल स्पीकर को आतंकी जैसा अपराधी

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मुंबई के RA स्टूडियो में बच्चों को बंधक बनाए जाने की सनसनीखेज घटना ने न केवल पुलिस और प्रशासन को हिला दिया, बल्कि समाज को यह सोचने पर विवश कर दिया कि एक मोटिवेशनल स्पीकर और शिक्षाविद जैसे व्यक्ति को इतना चरम कदम क्यों उठाना पड़ा?

रोहित आर्य, जो खुद को एक्टिंग कोच, मोटिवेशनल स्पीकर और प्रोजेक्ट डायरेक्टर कहता था, महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग से जुड़े एक “स्वच्छता मॉनिटर” और “माझी शाळा सुंदर शाळा” जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर असंतुष्ट थे।

उनका आरोप था कि उन्होंने इस अवधारणा की शुरुआत की, लेकिन राज्य सरकार ने बिना श्रेय या भुगतान के इसे लागू कर दिया। यह शिकायत उन्होंने कई बार की, पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के निवास के बाहर भी प्रदर्शन किए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

उनकी पत्नी अंजलि आर्य के मुताबिक, प्रोजेक्ट के लिए मंजूर भुगतान रोका गया था और लगातार उपेक्षा के कारण वे मानसिक तनाव में थे। जब किसी ने उनकी बात नहीं सुनी, तो उन्होंने यह भयावह कदम उठाया, आत्महत्या के बजाय “बच्चों को बंधक” बनाकर अपनी आवाज बुलंद करने का प्रयास।

घटना के दौरान जारी उनके वीडियो ने यह स्पष्ट किया कि वे खुद को आतंकवादी नहीं, बल्कि न्याय मांगने वाला व्यक्ति बता रहे थे। उन्होंने कहा कि उनकी “मांगें नैतिक और सामाजिक” हैं, न कि आर्थिक। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह संघर्ष नैतिक था, तो इसका रूप हिंसक क्यों बना?

पुलिस के अनुसार, रोहित ने सबसे पहले गोली चलाई, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में वे मारे गए। घटनास्थल से पिस्टल, केमिकल और लाइटर भी बरामद हुए। यद्यपि बंधक बनाए गए सभी बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया, पर यह मामला अब मजिस्ट्रियल जांच की मांगों के बीच खड़ा है।

इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक व्यक्ति जो युवाओं को प्रेरित करता था, उसे व्यवस्था की बेरुखी ने निराशा और प्रतिशोध की सीमा तक पहुंचा दिया। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पुलिस कार्रवाई सही थी या नहीं, बल्कि यह भी कि क्या सरकारी विभागों में प्रोजेक्ट्स के भुगतान और श्रेय वितरण की पारदर्शी प्रणाली है? क्या ऐसे मानसिक रूप से टूटते नागरिकों की पहचान समय रहते की जा सकती है?

रोहित आर्य की मौत एक चेतावनी है, जब व्यवस्था संवाद खो देती है, तो समाज में संवाद हिंसा का रूप ले लेता है।
अब देखना यह है कि क्या राज्य सरकार और शिक्षा विभाग आत्ममंथन करेंगे, या यह घटना भी मीडिया की सुर्खियों तक सिमटकर रह जाएगी।


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