✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | देश के रियल एस्टेट बाजार में मचा भूचाल अब खुलकर सतह पर आ गया है। ‘एनारॉक रिसर्च’ के ताज़ा आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि भारत के शीर्ष सात शहरों में मकानों की कीमतें निर्माण लागत की तुलना में दोगुनी रफ्तार से भी ज्यादा यानी 59% तक उछल चुकी हैं। साल 2021 से 2025 के बीच जहां मकान बनाने की औसत लागत 3,604 रुपये प्रति वर्ग फीट पर आकर थमी, वहीं औसत रेजिडेंशियल कैपिटल वैल्यू 9,260 रुपये प्रति वर्ग फीट के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा। यह खतरनाक अंतर इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि आम आदमी के अपने घर का सपना अब केवल एक कोरा छलावा बनकर रह गया है।
एक तरफ मध्यम वर्ग और सामान्य परिवार बढ़ती महंगाई और होम लोन के भारी-भरकम बोझ तले पिस रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश की शीर्ष रियल एस्टेट कंपनियों का राजस्व और मुनाफा आसमान छूते नए रिकॉर्ड बना रहा है। कोरोना महामारी के बाद के दौर में देश के शीर्ष 28 लिस्टेड रियल एस्टेट डेवलपर्स की संयुक्त प्री-सेल्स (बिक्री बुकिंग) वित्त वर्ष 2025-26 तक रिकॉर्ड 1.95 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी है।
इस दौरान, अकेले गोदरेज प्रॉपर्टीज की सेल्स बुकिंग उछलकर 34,171 करोड़ रुपये, प्रेस्टीज एस्टेट्स की 30,024 करोड़ रुपये, लोधा डेवलपर्स (मैक्रोटेक) का राजस्व 20,530 करोड़ रुपये और डीएलएफ की सेल्स बुकिंग 20,143 करोड़ रुपये दर्ज की गई है। सवाल यह है कि जब देश का आम नागरिक सिर पर छत जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब बिल्डर्स की तिजोरियों में बरस रहे इस बेतहाशा मुनाफे का आखिर गणित क्या है?
इस पूरी महंगाई के केंद्र में ज़मीन की आसमान छूती कीमतें हैं, जो सारे समीकरण बिगाड़ रही हैं। सीमेंट, स्टील और लेबर के विपरीत ज़मीन की लागत कंस्ट्रक्शन कॉस्ट के आंकड़ों में शामिल नहीं होती, लेकिन 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच देश के टॉप-7 शहरों में ज़मीन के दाम 50% से 120% तक भड़क चुके हैं। एनसीआर में ज़मीनों के दाम सबसे आक्रामक रूप से 70% से 130% और बेंगलुरु में 60% से 120% तक उछले हैं।
एनारॉक ग्रुप के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के मुताबिक, किसी भी इलाके में नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की आहट मात्र से, लॉन्चिंग से ठीक पहले ही ज़मीन के दाम आसमान छूने लगते हैं, जिसका फायदा उठाकर डेवलपर्स लागत बढ़ने का हवाला देकर रातों-रात कीमतें कई गुना बढ़ा देते हैं।
दूसरी ओर, भू-राजनीतिक तनावों और खासकर मिडिल ईस्ट युद्ध की आग ने निर्माण लागत पर 8 से 10% की अतिरिक्त मार कर दी है। टीएमटी स्टील बार की कीमतें करीब 20% उछलकर 72,000 रुपये प्रति टन के स्तर पर पहुँच चुकी हैं, जबकि तांबा और एल्यूमीनियम के दाम में आग लगने से MEP (मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग) का खर्च 2023 से 2025 के बीच 17% से अधिक बढ़कर कुल निर्माण लागत का 22% हिस्सा बन चुका है। अकेले मुंबई महानगर क्षेत्र में यह बढ़ोतरी सबसे ज़्यादा 19.6% दर्ज की गई है।
बाजार की इस निर्मम हकीकत में बिल्डर्स का खेल पूरी तरह साफ है। वे जानबूझकर आम आदमी के बजट वाले अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट से दूरी बना रहे हैं और सारा जोर केवल हाई-एंड या लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर लगा रहे हैं, ताकि उनका प्रॉफिट मार्जिन हर हाल में सुरक्षित रहे। लग्जरी हाउसिंग के खरीदार कम कीमत-संवेदनशील होते हैं, इसलिए डेवलपर्स आसानी से सारी बढ़ी हुई लागत उन पर थोप रहे हैं। इसके विपरीत, किफायती और मिडल-इनकम हाउसिंग सेगमेंट में हाहाकार मचा है और खरीदारों की जेब जवाब दे चुकी है, जिसके चलते डेवलपर्स अब मजबूरन प्रोजेक्ट्स का आकार छोटा करने या नए लॉन्च लटकाने के खेल में लगे हैं।
