बैंकिंग जगत के लिए कड़ा सबक: प्रमोटरों की हजारों करोड़ की ‘कागजी गारंटी’ के सामने वास्तविक रिकवरी शून्य साबित
NCLT बेंच में गतिरोध के बाद तीसरे सदस्य की मुहर, 80.81% वोट के सहारे ₹22,000 करोड़ का विवाद ₹6.5 करोड़ में सिमटा
✍️ विशेष आर्थिक रिपोर्ट, मुंबई / नई दिल्ली | नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा ज़ी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले में 25 अगस्त को दिए गए आदेश ने देश की पूरी बैंकिंग व्यवस्था की बुनियाद हिला दी है। कर्जदाताओं के ₹3,992 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले ट्रिब्यूनल ने महज ₹6.5 करोड़ के पुनर्भुगतान प्रस्ताव (Repayment Plan) को अंतिम मंजूरी दे दी है। इस फैसले ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में प्रमोटरों द्वारा दी जाने वाली ‘पर्सनल गारंटी’ की साख पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है, क्योंकि हजारों करोड़ रुपये के बकाये के बदले बैंकों के हाथ में 99.8% के नुकसान के सिवा कुछ नहीं बचा है।
वर्ष 2024 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका से शुरू हुई यह व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बड़ा सबक बनकर सामने आई है। इस फैसले ने यह कड़वी हकीकत उजागर कर दी है कि कॉरपोरेट लोन बांटते समय प्रमोटरों से हजारों करोड़ रुपये की पर्सनल गारंटी लिखवाने के बावजूद यदि उनके पास कानूनी रूप से प्रवर्तनीय तरल संपत्तियां मौजूद नहीं हैं, तो कागजी गारंटी के आधार पर वास्तविक रिकवरी शून्य के बराबर रह जाती है।
यह मामला बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि वे केवल प्रमोटर गारंटी के वजूद पर भरोसा करने के बजाय उसकी वास्तविक गुणवत्ता, कानूनी प्रवर्तनीयता और वसूली-क्षमता का कठोर आकलन करें। पर्सनल गारंटी बैंक खाते में रखे कैश जैसी नहीं होती और इसका अंतिम मूल्य सिर्फ गारंटर की कानूनी रूप से उपलब्ध संपत्ति पर ही निर्भर करता है।
यह विवादास्पद फैसला ट्रिब्यूनल की आम सहमति से नहीं आया था। इससे पहले दो सदस्यीय NCLT बेंच ने इस रीपेमेंट प्लान पर खंडित फैसला (Split Verdict) दिया था। सदस्यों के बीच गहरा मतभेद होने पर NCLT के न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा को इस गतिरोध को सुलझाने के लिए तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। तीसरे सदस्य ने अंततः पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। ट्रिब्यूनल ने व्यावहारिक तर्क दिया कि उपलब्ध वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर यह योजना मामले को सीधे दिवालियापन (Bankruptcy) में धकेलने की तुलना में बेहतर विकल्प है, क्योंकि पूर्ण परिसमापन से मिलने वाली रिकवरी इससे भी कम हो सकती थी।
80.81% वोट शेयर के बूते पास हुआ प्लान, असंतुष्ट कर्जदाताओं की आपत्तियां खारिज
कर्जदाताओं ने नाममात्र की वसूली और देनदार की वास्तविक वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की थी। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने फॉरेंसिक जांच की मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने के लिए यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत इस योजना को करीब 80.81% वोटिंग शेयर का आवश्यक समर्थन हासिल था, जिसके चलते ट्रिब्यूनल ने लेनदारों के वाणिज्यिक निर्णय (Commercial Decision) को सर्वोपरि माना। नियमों के मुताबिक, आवश्यक बहुमत से योजना पास होने के बाद असंतुष्ट अल्पसंख्यक लेनदार प्रक्रिया से अलग होकर किसी विशेष निपटारे की मांग नहीं कर सकते।
‘व्यक्तिगत कर्ज नहीं, सिर्फ गारंटर था’: सुभाष चंद्रा के कार्यालय का रुख
सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने किसी भी ऋणदाता से व्यक्तिगत स्तर पर कोई उधार नहीं लिया था, बल्कि वे सिर्फ एस्सेल समूह से जुड़ी कंपनियों के कॉरपोरेट कर्जों के लिए पर्सनल गारंटर थे। कार्यालय के अनुसार, योजना का विरोध करने वालों का दावा 3,992 करोड़ रुपये का था, न कि 22,000 करोड़ रुपये का। इसमें से भी 620 करोड़ रुपये का दावा पहले ही सुलझा लिया गया है और संबंधित कंपनियों ने 1,063 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने की पेशकश की है। बयान में यह भी रेखांकित किया गया कि जिन कंपनियों के लिए गारंटियां दी गई थीं, वे अब तक 43,000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी हैं।
₹45,888 करोड़ की नेटवर्थ का खंडन: ₹31.79 करोड़ बची घोषित संपत्ति
सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने 2017 में उनकी नेटवर्थ 45,888 करोड़ रुपये होने के दावों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि यह भ्रामक आंकड़ा समूह की कंपनियों के मार्केट कैप के आधार पर था। 2016 में संसद में दाखिल हलफनामे में उनकी संपत्ति 39.08 करोड़ रुपये घोषित थी, जो 2024 में रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के सामने घटकर 31.79 करोड़ रुपये रह गई, क्योंकि कंपनियों के संकट के समय उन्होंने अपने निजी खाते से कर्मचारियों के वेतन का भुगतान किया था। इस घोषित संपत्ति में लगभग 25 करोड़ रुपये का एक रिहायशी मकान शामिल है, जिसके चलते उपलब्ध वित्तीय साधनों के आधार पर ही 6.5 करोड़ रुपये का पुनर्भुगतान प्रस्ताव तैयार किया गया।
