80 करोड़ सरकारी राशनधारियों वाले देश में जनता के टैक्स के पैसे से सज रही ‘इवेंट्स’ की दुकानें!
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, लखनऊ/नई दिल्ली | सत्ता में आने से पहले भाजपा के जो नेता पूर्ववर्ती सरकारों पर जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी और सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप लगाते नहीं थकते थे, सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वे सारे वादे और नैतिक बातें भूलकर खुद व्यक्तिगत ब्रांडिंग के मद में पूरी तरह डूब चुके हैं। जिस सरकारी खजाने का इस्तेमाल जर्जर अस्पतालों, बदहाल स्कूलों और जनहित की योजनाओं में होना चाहिए था, उसे अपनी छवि चमकाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘इवेंट’ आयोजित करने में बहाया जा रहा है। हाल ही में सामने आए आधिकारिक आंकड़ों और आरटीआई जांच के आधार पर यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछले आठ वर्षों (2017-18 से 2024-25) के दौरान केवल अपनी ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार पर ही 6,811.94 करोड़ रुपये उड़ा दिए हैं।
एक तरफ देश की 140 करोड़ आबादी में से 80 करोड़ से अधिक लोगों को हर महीने 5 किलो सरकारी मुफ्त राशन की कतार में खड़ा रखा गया है, तो दूसरी तरफ उसी जनता की गाढ़ी कमाई से सत्ता के ‘इवेंट्स’ को चमकाने का खेल बदस्तूर जारी है। आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार हर रोज़ औसतन 2.32 करोड़ रुपये जनता के टैक्स का पैसा सिर्फ अखबारों, टीवी और डिजिटल विज्ञापनों में अपनी वाहवाही लूटने में फूंक रही है। प्रचार-प्रसार की यह भूख इस कदर हावी है कि यह आंकड़ा केंद्र की मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों के औसतन 1.5 करोड़ रुपये प्रतिदिन के प्रचार खर्च को भी बहुत पीछे छोड़ चुका है।
पब्लिसिटी के इस ‘महा-बजट’ का 83 प्रतिशत से अधिक हिस्सा, यानी लगभग 5,658 करोड़ रुपये, केवल “विज्ञापन और विजुअल प्रचार” के नाम पर लुटाया गया। साल 2017-18 में जो विज्ञापन बजट 294.86 करोड़ रुपये था, वह विधानसभा चुनाव वाले साल 2022-23 में छलांग लगाकर सीधे 1,420.03 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा।
इतना ही नहीं, यह खर्चीली भूख सिर्फ सूचना विभाग तक सीमित नहीं रही; राज्य के ‘उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन विभाग’ ने भी पिछले दो सालों में 60 करोड़ रुपये प्रचार में उड़ाए, जिसमें प्रयागराज कुंभ के दौरान 12 करोड़ रुपये और एक निजी मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ केवल प्रोमोशनल कंटेंट के लिए किया गया 70 लाख रुपये का सौदा शामिल है। इस जनता के पैसे से किसको कितना फ़ायदा पहुंचा, जब इस पर आरटीआई लगाई गई तो सरकारी पारदर्शिता की पोल खुल गई। अधिकतर अर्जियों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया गया या खारिज कर दिया गया। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भी 918.83 करोड़ रुपये का बजट तय कर दिया गया है, जिसके बाद यूपी सरकार का कुल पब्लिसिटी बिल 7,730 करोड़ रुपये के पार निकल जाएगा।
दूसरी तरफ, वैश्विक मंचों पर ‘विश्वगुरु’ का ढोल पीटने के नाम पर केंद्र सरकार भी पीछे नहीं है। विदेश राज्य मंत्री द्वारा राज्यसभा में दिए गए लिखित आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर 550 करोड़ रुपये से अधिक का सरकारी खजाना खाली हो चुका है। पीएम की विदेश उड़ानों का बिल साल-दर-साल तेजी से ऊपर चढ़ा है, जो 2021 में 36 करोड़ रुपये था, वह 2025 में बढ़कर 180 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया, जबकि साल 2026 में केवल कुछ ही महीनों के भीतर 74.58 करोड़ रुपये का बिल पहले ही आ चुका है। अकेले मई 2026 में नॉर्वे यात्रा के नाम पर 17.46 करोड़ रुपये उड़ा दिए गए।
विदेश मंत्रालय भले ही इन दौरों से 381.8 अरब डॉलर के एफडीआई और 316 एमओयू का दावा करके अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन सरकारी खजाने के इन चौंकाने वाले आंकड़ों ने यह साफ़ कर दिया है कि आम आदमी की थाली भले ही खाली हो रही हो, लेकिन शासन-प्रसार के स्तर पर ‘ब्रांडिंग’ और शाही विदेश यात्राओं के लिए सरकारी खजाने का मुंह हमेशा खुला हुआ है।
