RSS की ग्लोबल नैरेटिव पर नजर: नागपुर से शुरू हुई वैचारिक कब्जे की जंग
मुंबई/नागपुर/नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने अस्तित्व के सौवें वर्ष में कदम रखते ही एक ऐसी मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दीवार ढहाने की कोशिश की है, जिसे ढाल बनाकर दुनिया अब तक उसे हाशिए पर रखती आई थी। 2 अक्टूबर को नागपुर के रेशीमबाग मैदान में आयोजित शताब्दी समारोह पारंपरिक ‘शक्ति प्रदर्शन’ से कहीं अधिक, संघ के ‘वैश्विक अछूतपन’ (Global Untouchability) को मिटाने का एक सुनियोजित ‘इंटरनेशनल ब्रैंडिंग’ इवेंट था। मंच पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की उपस्थिति के बीच असली ध्यान उन विदेशी चेहरों पर था, जिन्हें संघ ने अपनी नई वैश्विक स्वीकार्यता के ‘ट्रॉफी’ के रूप में दुनिया के सामने पेश किया।
लॉबिंग की वैशाखियों पर ‘सॉफ्ट पावर’ का सपना
संघ की इस अचानक बढ़ी अंतर्राष्ट्रीय चमक-दमक के पीछे कोई हृदय परिवर्तन नहीं, बल्कि अमेरिकी पीआर (पीआर) और लॉबिंग फर्मों का भारी-भरकम निवेश है। खोजी न्यूज़ आउटलेट ‘प्रिज्म’ और ‘द कारवां’ के खुलासे इस कड़वे सच की तस्दीक करते हैं कि वाशिंगटन के गलियारों में संघ के लिए ज़मीन तैयार करने का काम ‘स्क्वायर पैटन बॉग्स’ जैसी नामी लॉबिंग फर्मों को सौंपा गया था।
जून में ही पूर्व रिपब्लिकन सांसद बिल शुस्टर और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के स्तंभकार वाल्टर रसेल मीड का नागपुर दौरा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि संघ अब अपनी पहचान को ‘री-ब्रैंड’ करने के लिए अमेरिकी कंसल्टेंसी ‘वन+ स्ट्रैटेजीज’ की कूटनीतिक वैशाखियों का सहारा ले रहा है।
नैतिकता का संकट: जब ‘वॉचडॉग’ ही ‘प्रदर्शनी’ बन गए
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू उन अमेरिकी पत्रकारों की व्यावसायिक नैतिकता है, जिन्होंने एक विवादित विचारधारा के मंच पर स्वेच्छा से ‘प्रदर्शनी’ बनना स्वीकार किया। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ जैसे संस्थानों के संपादक और स्तंभकार, जिन्हें सत्ता से कठिन सवाल पूछने वाले ‘वॉचडॉग’ (प्रहरी) के रूप में जाना जाता है, वे नागपुर के मंच पर हाथ जोड़कर अपना परिचय देते हुए संघ के पीआर ढांचे का हिस्सा बन गए।
जब ये पत्रकार एक ऐसे संगठन के मंच पर ‘ट्रॉफी’ के रूप में खड़े हुए, जिसका अतीत लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संशयास्पद रहा है, तो उन्होंने न केवल अपनी निष्पक्षता खोई, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता के उन मानदंडों को भी दांव पर लगा दिया जो ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) से बचने की सलाह देते हैं। यह सवाल बना रहेगा कि क्या इन पत्रकारों ने संघ की विचारधारा को समझा, या वे महज़ एक विदेशी कूटनीतिक दौरे के महंगे आतिथ्य का हिस्सा बनकर रह गए?
इमेज लॉन्ड्रिंग: जब लाठियां ‘बेअसर’ बताई गईं
संघ की इस रणनीतिक निवेश का प्रतिफल उन लेखों में दिखा, जो नागपुर से लौटे अमेरिकी पत्रकारों ने लिखे। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के जिम गेराघटी और ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की लीना बेल जैसे ओपिनियन मेकर्स की मंच पर उपस्थिति ने संघ को वह ‘लिबरल सर्टिफिकेट’ देने की कोशिश की, जिसके लिए वह दशकों से तरस रहा था। गेराघटी का यह तर्क कि “बंदूक के बिना लाठीधारी समूह को अर्धसैनिक कहना अजीब है,” दरअसल उसी ‘इमेज लॉन्ड्रिंग’ का हिस्सा है, जो संघ के हिंसक अतीत और फासीवादी रुझानों पर पर्दा डालने के लिए गढ़ा गया है।
परिभाषाओं का संकट और कड़वा सच
परंतु, क्या केवल बंदूकों की अनुपस्थिति किसी संगठन को ‘अर्धसैनिक’ होने के तमगे से मुक्त कर सकती है? ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ और यूरोपीय फासीवाद के ऐतिहासिक दस्तावेज़ इस नैरेटिव को सिरे से खारिज करते हैं। अर्धसैनिक संगठन (Paramilitary) होने की अनिवार्य शर्त हथियार नहीं, बल्कि सैन्य पदानुक्रम, कठोर अनुशासन, विशिष्ट वर्दी और एक ही विचार के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता है, जो संघ के डीएनए में इसकी स्थापना (1925) के समय से ही मौजूद है। 1920 के दशक के यूरोपीय मिलिशिया मॉडलों से संघ के ढांचे की यह समानता ही वह ‘वैश्विक कलंक’ है, जिसे धोने के लिए आज करोड़ों डॉलर की लॉबिंग की जा रही है।
रिमोट कंट्रोल से ग्लोबल कंट्रोल तक: लॉबिंग और डॉलर के दम पर संघ का ‘विश्व गुरु’ प्रोजेक्ट
राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए नागपुर का यह आयोजन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संघ अब केवल भारत की सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ बनकर संतुष्ट नहीं है। वह अब ‘ग्लोबल नैरेटिव’ (वैश्विक विमर्श) को नियंत्रित करना चाहता है।
अमेरिकी पत्रकारों की वह मंच पर दिखाई दी मुस्कान दरअसल संघ की उस महंगी परियोजना की सफलता का प्रतीक है, जिसका लक्ष्य उसे एक ‘कट्टरपंथी मिलिशिया’ के ठप्पे से आज़ाद कर एक ‘सांस्कृतिक शक्ति’ के रूप में पेश करना है।
आरएसएस का यह शताब्दी वर्ष का यह अध्याय केवल उत्सव नहीं, बल्कि ‘वैश्विक अछूतपन’ को ‘वैश्विक प्रमाणन’ में बदलने का एक खतरनाक और गहरा राजनीतिक दांव है।
