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सीएए विरोध प्रदर्शन पर सहयोगी न्यायाधीश की टिप्पणी से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश असहमत

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मुंबई। दिल्ली में आयोजित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होने वाले विदेशी नागरिकों के खिलाफ मामलों को खारिज करने वाली अदालत की पीठ का हिस्सा रहे बंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम. जी. सेवलीकर ने कहा कि वह फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों से असहमत थे। उन्होंने शुक्रवार को चार पन्नों का अपना आदेश जारी किया।


बंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सेवलीकर ने कहा कि संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के खिलाफ हुई कार्रवाई के संदर्भ में अपने साथी न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी. वी. नलावडे की ओर से की गई टिप्पणी से वह सहमत नहीं थे। उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति नलावडे और न्यायमूर्ति सेवलीकर की एक खंडपीठ ने मार्च 2020 में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होने वाले 29 विदेशी नागरिकों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने का आदेश दिया था। इन लोगों के खिलाफ कथित तौर पर वीजा शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

पीठ ने 21 अगस्त को सुनवाई के दौरान यह फैसला देते हुए कहा कि आरोपियों को “बलि का बकरा” बनाया गया और उन पर निराधार आरोप लगाए गए कि वे देश में कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार के लिये जिम्मेदार हैं। पीठ ने यह भी कहा था कि राज्य सरकार ने “राजनीतिक बाध्यताओं” के चलते कार्रवाई की और तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए विदेशियों के खिलाफ बड़ा दुष्प्रचार किया गया।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था, “महामारी या विपत्ति आने पर राजनीतिक सरकार बलि का बकरा ढूंढने की कोशिश करती है और हालात बताते हैं कि संभावना है कि इन विदेशी लोगों को बलि का बकरा बनाने के लिए चुना गया था।”

न्यायमूर्ति सेवलीकर ने कहा था कि वह आदेश (प्राथमिकी रद्द करने) के मूल अंश से जहां सहमत हैं वहीं वह न्यायमूर्ति नलावडे की कुछ टिप्पणियों से भी सहमत नहीं हैं और एक अलग आदेश पारित करेंगे। न्यायमूर्ति सेवलीकर ने कहा, “मैं (सीएए और एनआरसी पर) टिप्पणियों से एकमत नहीं हूं क्योंकि इस संबंध में याचिकाओं में आरोप नहीं लगाए गए हैं और न ही इस संदर्भ में कोई साक्ष्य हैं।” उन्होंने कहा, “इसलिये, मेरी राय में यह टिप्पणियां याचिका के दायरे से बाहर हैं।” न्यायमूर्ति नलावडे ने अपने आदेश में कहा था कि सीएए और एनआरसी के खिलाफ देश भर में मुस्लिम समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किये गए क्योंकि उनका मानना था कि मुस्लिम शरणार्थियों और प्रवासियों को नागरिकता नहीं दी जाएगी।

 


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