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संवैधानिक जनतंत्र पर फासीवाद के खतरे को लेकर कोई विचारोत्तेजक बहस क्यों नहीं है?

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“स्वाधीनता पूर्व के वर्षों में वर्ण और वर्ग से मुक्त लेखन की प्रेमचंद की जिस परम्परा का सूत्रपात हुआ था, पिछले कुछ दशकों के हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में उसका...