✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | ’डिजिटल इंडिया’ का ढोल जब पीटा जा रहा था, तब गली-कूचे में चाय की थड़ी से लेकर राशन की दुकान तक पीले-नीले बारकोड चिपका दिए गए थे। जनता को बड़े गर्व से समझाया गया कि बटुआ घर छोड़ आइए, अब मोबाइल ही आपका खजाना है। उस वक्त न कोई फीस थी, न कोई टैक्स। जनता ने भी जेब से नकद निकालना छोड़ मोबाइल पर अंगूठा घिसना अपनी शान समझ लिया। अब जब देश के 140 करोड़ लोगों को इस डिजिटल अफीम की लत लग चुकी है, तो हुकूमत ने धीरे से अपना पुराना बहीखाता खोल दिया है।
वित्त मंत्रालय का ताजा फरमान आया है- 2,000 रुपये तक के यूपीआई (UPI) और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा। सरकारी भोंपू इसे ‘राहत’ बताकर जश्न मना रहे हैं। लेकिन इस चालाकी की तह में झांकिए तो समझ आएगा कि हुकूमत ने असल में 2,000 रुपये से ऊपर के भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वसूलने का वैधानिक दरवाजा खोल दिया है। संसद में ‘भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम’ की धारा 10A में संशोधन कर यह इंतजाम बाकायदा पुख्ता कर दिया गया है।
अब जरा एसी कमरे में बैठकर लाखों – करोड़ों के वारे न्यारे करने वाले भाजपा सरकार के नीति-निर्माताओं की समझदारी तो देखिए, जहां उसने 2,000 रुपये को ही ‘बड़ा लेन-देन’ मान लिया है। साहब बहादुर, जिस मुल्क में सरसों का तेल, दाल, आटा, बच्चों के दूध और रसोई गैस सिलेंडर की कीमत ने घरेलू रसोई का मासिक बिल अकेले ही 7 से 10 हजार रुपये के पार पहुंचा दिया हो, वहां 2,000 रुपये की क्या औकात रह गई है?
आज किसी मध्यमवर्गीय परिवार का मुखिया महीने का राशन लेने सुपरमार्केट या थोक किराना दुकान पर जाए, तो ट्रॉली बिलिंग काउंटर तक पहुंचते-पहुंचते 5,000 से 8,000 रुपये छू लेती है। बच्चे की स्कूल ड्रेस, बुजुर्ग की बीपी-शुगर की दवाएं या महीने भर का पेट्रोल इनमें से कौन सा बुनियादी खर्च आज 2,000 रुपये के भीतर सिमटता है?
सरकार और उसके पैरोकार बड़ी मासूमियत से यह दलील देंगे कि “एमडीआर तो व्यापारी चुकाएगा, आम ग्राहक पर कोई भार नहीं पड़ेगा”। इस सफेद झूठ पर कोई नासमझ ही यकीन कर सकता है।
कैरी बैग जो पहले शॉपिंग मॉल्स में फ्री में मिलती थी, उसके भी 25 रुपये वसूल लिया जाता है। तो क्या हिंदुस्तान का कोई भी व्यापारी अपनी जेब काटकर बैंकों और फिनटेक कंपनियों को 0.3% से 0.5% का एमडीआर देगा?
बिल्कुल नहीं। जो व्यापारी 7 हजार रुपये के राशन बिल पर 25 से 35 रुपये का शुल्क बैंक को भरेगा, वह सीधे या तो उस लागत को सामान की एमआरपी में जोड़ देगा, या फिर काउंटर पर साफ तख्ती लटका देगा- “2000 रुपये से ऊपर यूपीआई करेंगे तो 1% एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा या फिर कैश दीजिए।”
नतीजा क्या होगा?
जिस आम आदमी की कमर पहले ही बेलगाम महंगाई ने तोड़ रखी है, उसे अपनी ही गाढ़ी कमाई खर्च करने के लिए इस अप्रत्यक्ष टैक्स की मार सहनी होगी। बैंकों और अरबों रुपये जुटाने वाली फिनटेक कंपनियों के घाटे को पाटने के लिए सरकार ने सीधे आम उपभोक्ता की जेब पर डाका डालने का रास्ता साफ कर दिया है।
फिलहाल भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और उसकी स्टीयरिंग कमेटी यह तय करने में जुटी है कि यह दर 0.3% होगी या 0.5%, और इसे आगामी महीनों की किस तारीख से लागू किया जाएगा।
लेकिन बनियन की सरकार की मंशा एकदम शीशे की तरह साफ हो चुकी है। पहले ‘कैशलेस इकोनॉमी’ का ख्वाब दिखाकर जेब से नकद छुड़वाया, और जब जनता पूरी तरह इस तंत्र की बंधक बन गई, तो अब हर बड़े स्वाइप और हर बड़े स्कैन पर वसूली का जाल बिछा दिया गया। डिजिटल इंडिया के इस नए दौर में आपका स्वागत है, जहां सांस लेने के अलावा बाकी हर चीज पर कोई न कोई ‘नॉमिनल’ चार्ज तय है।
