टॉप पदों पर 80-90% सवर्णों का दबदबा; जातिगत डेटा देने से बच रहा सत्ता-तंत्र
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | देश में जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय पर जारी तीखी सियासी रस्साकशी के बीच सरकारी दस्तावेजों, आरटीआई और स्वतंत्र अध्ययनों की पड़ताल ने सत्ता के शीर्ष तंत्र की एक असहज करने वाली तस्वीर उजागर की है।
भारत के नीति-निर्माण, न्यायपालिका, शीर्ष शिक्षण संस्थानों और कॉर्पोरेट सेक्टर के नीतिगत पदों पर आज भी सामान्य व उच्च जातियों का 60 से 93 फीसदी तक एकाधिकार बना हुआ है, जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी वाले एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग झाड़ू-सफाई जैसे चतुर्थ श्रेणी के श्रम तक सिमटे हैं। इस भारी संरचनात्मक असंतुलन के बावजूद केंद्र सरकार प्रशासनिक संवर्गों की जातिवार पहचान का प्रामाणिक डेटा सार्वजनिक करने से लगातार कतरा रही है।
कार्मिक मंत्रालय (DoPT) के आधिकारिक आंकड़े ही सरकारी तंत्र के इस ‘उल्टे पिरामिड’ की गवाही देते हैं। केंद्र सरकार के कुल कार्यबल में सामान्य वर्ग 55..2 फीसदी, ओबीसी 21.3 फीसदी, एससी 15.8 फीसदी और एसटी 7.7 फीसदी हैं। लेकिन नीति तय करने वाले सबसे ताकतवर ग्रुप ‘ए’ अफसरों की फेहरिस्त में पहुंचते ही सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी सीधे 69 फीसदी पर पहुँच जाती है, जहां ओबीसी घटकर 15.1 फीसदी और एसटी महज़ 6.5 फीसदी पर सिमट जाते हैं।
इस अघोषित सवर्ण आरक्षण व्यवस्था का स्याह विरोधाभास निचले पायदान पर दिखता है, जहां केंद्र सरकार के सफाई कर्मचारियों में एससी, एसटी और ओबीसी की सम्मिलित हिस्सेदारी 68 फीसदी से अधिक है और सामान्य वर्ग 32 फीसदी से भी नीचे चला जाता है। नई आईएएस भर्तियों में आरक्षण के चलते आंशिक संतुलन जरूर दिखता है, मगर वास्तविक नीतिगत फैसले लेने वाले शीर्ष कैडर में यह खाई जस की तस बनी हुई है।
न्यायपालिका और देश के प्रीमियम अकादमिक संस्थानों की स्थिति और भी एकतरफा है। कानून मंत्रालय द्वारा संसद में पेश रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट्स में हाल के वर्षों में हुई कुल नियुक्तियों में 75 से 82 फीसदी जज अकेले सामान्य वर्ग से आए, जबकि 12 फीसदी ओबीसी, 3 से 4 फीसदी एससी और बमुश्किल 2 फीसदी एसटी को जगह मिल सकी।
सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में हुए स्वतंत्र शोध बताते हैं कि शीर्ष अदालत में 60 फीसदी से अधिक जज उच्च जातियों से रहे हैं, जिनमें अकेले ब्राह्मण समुदाय की हिस्सेदारी करीब 36 फीसदी दर्ज की गई।
वहीं देश के बौद्धिक केंद्र कहे जाने वाले आईआईटी और आईआईएम में वर्ष 2024 के आरटीआई आंकड़े बताते हैं कि आईआईटी में 80 फीसदी और आईआईएम में 83 फीसदी प्रोफेसर सामान्य वर्ग से हैं, जहां एसटी फैकल्टी 1 से 1.6 फीसदी और एससी महज़ 5 से 6 फीसदी के बीच सीमित हैं।
आरक्षण व्यवस्था से बाहर के क्षेत्रों में यह खाई लगभग ‘सोशल मोनोपॉली’ का रूप ले लेती है। भारत की शीर्ष 1,000 कंपनियों के कॉर्पोरेट बोर्ड्स पर यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न ब्रिटिश कोलंबिया (UNBC) के प्रसिद्ध अध्ययन के मुताबिक, 93 फीसदी बोर्ड डायरेक्टर उच्च जातियों से थे, जिनमें अकेले ब्राह्मण और वैश्य समुदाय की हिस्सेदारी 90 फीसदी पाई गई, जबकि एससी-एसटी की मौजूदगी शून्य के बराबर थी।
इसी तरह, ऑक्सफैम के 2019 के अध्ययन में भी देश के 88 से 90 फीसदी न्यूज़रूम लीडर उच्च जातियों से पाए गए, जहां पिछड़े और वंचित तबकों का नेतृत्व शून्य था।
राज्यों के स्तर पर भी यही ढांचागत विषमता हावी है; बिहार के जाति सर्वे में सामने आया कि कुल आबादी के मुकाबले सरकारी नौकरियों के अनुपात में जहां कायस्थ (6.7%) और भूमिहार (4.9%) सबसे आगे हैं, वहीं मुसहर समुदाय 0.26 फीसदी और यादव समाज महज़ 1.55 फीसदी पर अटका है।
इस भारी असंतुलन के बीच सबसे बड़ा नीतिगत पेंच आँकड़ों की पारदर्शिता पर लगा पर्दा है। केंद्र सरकार सामान्य वर्ग के भीतर ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ या बनिया जैसी जातियों का कोई नियुक्ति रिकॉर्ड नहीं रखती।
DoPT ने अपनी 2024 की रिपोर्ट में ईडब्ल्यूएस (EWS) कोटे के तहत सेवा में आए कुल कर्मचारियों का स्टॉक डेटा साझा नहीं किया। संसद में भी फरवरी 2025 में आईएएस और आईपीएस के पूरे कैडर का जातिवार ब्योरा देने से इनकार कर दिया गया।
निजी क्षेत्र कानूनी बाध्यता न होने के कारण जाति दर्ज नहीं करता और सरकारी श्रम सर्वेक्षण (PLFS) में ‘अन्य’ श्रेणी में सामान्य वर्ग के साथ कई अवर्गीकृत समूहों को मिलाकर रखा जाता है, जिसके चलते आईटी, बैंकिंग और फिनटेक जैसे आधुनिक इकॉनमी के शीर्ष पदों पर वास्तविक सामाजिक भागीदारी का कोई भी प्रामाणिक राष्ट्रीय रजिस्टर देश के सामने मौजूद नहीं है।
