‘श्रृंकफ्लेशन’ के जरिए ग्रामेज घटाकर ग्राहकों की जेब काटने का खेल भी शुरू
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | भारतीय दैनिक उपभोग की वस्तुओं (FMCG) के बाज़ार में एक बार फिर कीमतों में इज़ाफे की सुगबुगाहट तेज हो गई है। देश की प्रमुख FMCG कंपनियां आगामी तिमाहियों में अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने की गंभीर योजना बना रही हैं। इस संभावित मूल्य वृद्धि के पीछे मुख्य कारण कच्चे माल की लागत (Input Costs) का लगातार ऊंचे स्तर पर बने रहना है।
कंपनियों का मानना है कि इनपुट्स की बढ़ती कीमतों के बोझ को अब और अधिक समय तक खुद वहन करना संभव नहीं है, और मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए इसे उपभोक्ताओं पर डालना अनिवार्य हो गया है। हालांकि, सीधे दाम बढ़ाने के साथ-साथ पैकेट का वजन घटाकर (Grammage Reduction) ‘श्रिंकफ्लेशन’ (Shrinkflation) के जरिए ग्राहकों के साथ आर्थिक चीटिंग का खुला खेल भी खेला जा रहा है, जहां दाम वही रखकर उत्पाद की मात्रा चुपके से कम कर दी जाती है।
बाज़ार सूत्रों और उद्योग जगत के दिग्गजों से मिल रही जानकारी के अनुसार, साबुन, तेल, शैम्पू, बिस्कुट और पैकेज्ड फूड जैसे दैनिक उपयोग के उत्पादों की कीमतों में 3 प्रतिशत से लेकर 8 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। कंपनियां इस बार मूल्य वृद्धि को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की रणनीति अपना रही हैं। उपभोक्ता को सीधे तौर पर बढ़ी हुई कीमत का अहसास न हो, इसके लिए कई मामलों में ‘श्रिंकफ्लेशन’ का सहारा लिया जा रहा है। यानी 10 रुपये वाले पैकेट की कीमत तो 10 रुपये ही रखी जाएगी, लेकिन उसके भीतर मिलने वाली सामग्री का वजन 10 से 15 फीसदी तक घटा दिया जाएगा।
इसे उपभोक्ता मामलों के जानकार एक तरह की ‘अदृश्य महंगाई’ और ग्राहकों के साथ छलावा मान रहे हैं, क्योंकि आम खरीदार अक्सर पैकेट के वजन पर ध्यान दिए बिना सिर्फ उसकी पुरानी कीमत देखकर सामान खरीद लेता है।
पिछले दो वर्षों से अधिक समय से वैश्विक और घरेलू स्तर पर कमोडिटी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। पाम ऑयल, कच्चा तेल (Crude Oil), पैकेजिंग सामग्री, लॉजिस्टिक्स और कृषि उपजों की लागत में लगातार वृद्धि ने FMCG कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर कड़ा दबाव बनाया है।
हालांकि, बीच में कुछ समय के लिए इनपुट्स की कीमतों में मामूली नरमी आई थी, लेकिन हाल के महीनों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं और असमान मानसून के कारण लागत फिर से बढ़ गई है। कंपनियां अब महसूस कर रही हैं कि दक्षता बढ़ाकर और आंतरिक लागत में कटौती करके इस बोझ को संभालना मुश्किल है।
मूल्य वृद्धि और ग्रामेज में कटौती की इस नई योजना के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक बाज़ार में मांग का मजबूत बने रहना है। कंपनियों को भरोसा है कि ग्रामीण और शहरी दोनों बाज़ारों में उपभोग (Consumption) की गति स्थिर है। पिछले कुछ तिमाहियों के वित्तीय नतीजों और बाज़ार के रुझानों से स्पष्ट है कि उपभोक्ता, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, ब्रांडेड उत्पादों पर खर्च करना जारी रखे हुए हैं।
ग्रामीण मांग, जो कुछ समय पहले सुस्त थी, उसमें भी अब सुधार के संकेत मिल रहे हैं। इस मजबूत मांग के माहौल में कंपनियां मानती हैं कि उपभोक्ता कीमतों में मामूली वृद्धि या मात्रा में की गई कटौती को स्वीकार कर लेंगे और इसका बिक्री की मात्रा (Sales Volume) पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
बढ़ती महंगाई और ‘श्रिंकफ्लेशन’ के इस दोहरे वार से आम आदमी की जेब पर सीधा और गहरा असर पड़ेगा। निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए घरेलू बजट को संतुलित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा, क्योंकि उन्हें उतनी ही कीमत चुकाने के बाद भी कम सामग्री मिलेगी।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि कंपनियां इसी तरह से पैकेट छोटे करने और दाम बढ़ाने का सिलसिला जारी रखती हैं, तो यह ग्रामीण बाज़ार में रिकवरी की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है, क्योंकि वहां के उपभोक्ता कीमतों और मात्रा दोनों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। यह स्थिति सरकार और रिज़र्व बैंक के लिए भी चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि यह खुदरा महंगाई दर को नियंत्रित रखने के प्रयासों को झटका दे सकती है।
