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सस्ती ब्याज दरें भी नहीं बढ़ा रहीं निवेश की रफ्तार, मांग की कमी से ‘प्राइवेट कापेक्स’ पर ब्रेक

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  • रेपो रेट 5.25% पर स्थिर, लेकिन कॉर्पोरेट भारत नए निवेश से अब भी सतर्क; PLI सेक्टरों तक सिमटा विस्तार

  • आरबीआई के सस्ते कर्ज के बाद भी नई फैक्ट्रियां लगाने से क्यों डर रहा ‘इंडिया इंक’? पढ़ें पूरी रिपोर्ट

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई |  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट को लगातार चौथी बार 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखकर उद्योग जगत को पिछले कई वर्षों का सबसे अनुकूल और अनुमानित ब्याज दर वातावरण उपलब्ध करा दिया है। अगस्त 2023 में 6.50 प्रतिशत से शुरू हुई दरों में कटौती के बाद वित्तपोषण पहले की तुलना में सस्ता हुआ है, लेकिन इसके बावजूद देश का निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र बड़े पैमाने पर पूंजीगत निवेश (Private Capex) शुरू करने को तैयार नहीं दिख रहा। इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत की अर्थव्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती महंगी पूंजी नहीं, बल्कि कमजोर मांग और अनिश्चित कारोबारी माहौल है।

हालांकि बैंकिंग प्रणाली में कर्ज वितरण लगातार बढ़ रहा है। जुलाई 2023 से जुलाई 2026 के बीच कृषि क्षेत्र का ऋण 17.87 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 26.94 लाख करोड़ रुपये, औद्योगिक ऋण 33.65 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 47.72 लाख करोड़ रुपये और पर्सनल लोन 47.32 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 71.14 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। इसी अवधि में हाउसिंग लोन 34.04 लाख करोड़ रुपये और क्रेडिट कार्ड बकाया 2.98 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद इन आंकड़ों का असर नए कारखानों, उत्पादन इकाइयों और बड़े विस्तार कार्यक्रमों में व्यापक रूप से दिखाई नहीं दे रहा।

विश्लेषकों का कहना है कि अधिकांश नया निवेश केवल सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों तक सीमित है। इसके विपरीत, गैर-पीएलआई क्षेत्रों की कंपनियां नकदी बचाने, बैलेंस शीट मजबूत रखने और सीमित विस्तार की रणनीति पर काम कर रही हैं।

इसके पीछे एक अहम वजह यह भी है कि रेपो रेट में कमी का पूरा लाभ उद्योग तक नहीं पहुंचता। कंपनियों की वास्तविक उधारी लागत में बैंकों की फंडिंग लागत, जोखिम प्रीमियम और बाजार की परिस्थितियां शामिल होती हैं। वहीं, बैंकों पर जमा राशि की ऊंची लागत का दबाव बना हुआ है, जिसे संतुलित करने के लिए आरबीआई फ्लोटिंग क्रेडिट रेट बॉन्ड (FCRB) जैसे उपाय अपना रहा है।

उद्योग जगत के वित्त प्रमुखों (CFOs) का मानना है कि ग्रामीण खपत में सुस्ती, एफएमसीजी और रिटेल सेक्टर में कमजोर मांग तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच केवल सस्ती ब्याज दरें निवेश का नया दौर शुरू नहीं कर सकतीं। कंपनियां तभी नई उत्पादन क्षमता में निवेश करेंगी, जब उन्हें भविष्य में मांग बढ़ने और क्षमता उपयोग में स्थायी सुधार का भरोसा मिलेगा।

स्पष्ट है कि मौद्रिक नीति अपनी भूमिका लगभग निभा चुकी है। अब भारत में निजी निवेश चक्र को गति देने की जिम्मेदारी मजबूत उपभोक्ता मांग, स्थिर कारोबारी माहौल और नीतिगत विश्वास पर आ गई है। जब तक बाजार में मांग का भरोसा नहीं लौटता, तब तक सस्ती पूंजी भी कॉर्पोरेट भारत को निवेश के लिए प्रेरित नहीं कर पाएगी।


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