2018 से 2025 तक के सरकारी आंकड़ों से सामने आई पूरी तस्वीर
यूपी में ₹38 लाख करोड़ के MoU, जमीन पर ₹4.33 लाख करोड़ का ही काम शुरू
रोजगार के आंकड़ों पर सरकार की चुप्पी
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, लखनऊ /नई दिल्ली | डबल इंजन सरकार के हाई-टेक प्रचार तंत्र और भव्य निवेश सम्मेलनों की चमक-दमक के पीछे उत्तर प्रदेश की औद्योगिक हकीकत कागजों और मंचों तक सिमटती नजर आ रही है। राज्य को ‘वन ट्रिलियन डॉलर’ अर्थव्यवस्था बनाने के भारी-भरकम दावों और मंचों पर बांटे गए सुनहरे सपनों के बीच ‘इन्वेस्ट यूपी’ के अपने ही आधिकारिक आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि लखनऊ के वातानुकूलित हॉलों में हुए लाखों करोड़ के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग (MoU) और जमीन पर धुआं छोड़ते कारखानों के बीच का फासला मीलों लंबा है।
तथ्यों की पड़ताल बताती है कि साल 2018 के ‘यूपी इन्वेस्टर्स समिट’ में सरकार ने 1,045 प्रस्तावों के जरिए 4.28 लाख करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया था, लेकिन तीन-तीन ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी (GBC) का तामझाम रचने के बाद भी धरातल पर लगभग 2.09 लाख करोड़ रुपये की ही परियोजनाएं उतर सकीं। यानी शुरुआती वादों का आधा हिस्सा भी जमीन तक नहीं पहुंचा और सरकारी दस्तावेजों के अनुसार उस समय तक महज 14 फीसदी निवेश ही वास्तविक रूप ले सका।
इसके बाद 2024 के आम चुनाव की जमीन तैयार करने के लिए फरवरी 2023 में आयोजित ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ में आंकड़ों की बाजीगरी को चरम पर पहुंचाया गया। पहले 33.50 लाख करोड़ रुपये और फिर संशोधित कर 28,606 समझौतों के साथ 37.81 लाख करोड़ रुपये के निवेश के दावे किए गए। दावा ऐसा था मानो समूचे देश का औद्योगिक पहिया अकेले उत्तर प्रदेश में ही घूमने लगेगा।
लेकिन हकीकत यह है कि जुलाई 2025 तक के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुल 12.10 लाख करोड़ रुपये के ग्राउंड ब्रेकिंग पोर्टफोलियो में से महज 8,363 परियोजनाएं ही 4.33 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ वाणिज्यिक संचालन (Commercial Operations) शुरू कर पाई हैं। शेष 8,115 परियोजनाएं 7.76 लाख करोड़ रुपये के साथ अब भी फाइलों और कार्यान्वयन (Implementation) के चक्रव्यूह में उलझी हैं।
सबसे बड़ा पेंच यह भी है कि सरकार जिन 8,363 परियोजनाओं के शुरू होने का ढिंढोरा पीट रही है, वे कोई नए विशाल कारखाने नहीं हैं। इनमें बड़ा हिस्सा आईटी, रियल एस्टेट, ऊर्जा, हॉस्पिटैलिटी और सर्विस सेक्टर जैसी पूर्व-नियोजित योजनाओं का है, जिन्हें औद्योगिक क्रांति का नाम देकर पेश किया गया।
इससे भी गंभीर सवाल रोजगार के मोर्चे पर है, जिस पर केंद्र और राज्य दोनों की रणनीतिक चुप्पी है। सम्मेलनों के मंच से युवाओं को ‘लाखों नौकरियों’ के सुनहरे सपने बेचे गए, लेकिन वास्तविकता में आज तक सरकार के पास कोई सार्वजनिक या ऑडिटेड डेटा उपलब्ध नहीं है, जो यह बता सके कि इन बहुप्रचारित 38 लाख करोड़ के करारों से राज्य के कितने युवाओं को स्थायी और नियमित रोजगार मिला।
2018 के समिट में 2.09 लाख करोड़ रुपये के निवेश पर 3.24 लाख नौकरियों की बात कही गई थी, लेकिन उसके बाद वास्तविक रोजगार केवल भाषणों का हिस्सा बनकर रह गया। साफ है कि प्रचार की चकाचौंध में MoU की संख्या लाखों में गिनवाई जा सकती है, लेकिन जब बात जमीनी उत्पादन और नौजवानों की आजीविका की आती है, तो ‘ट्रिलियन डॉलर’ का यह मॉडल केवल आंकड़ों का भ्रमजाल साबित होता है।
