‘ब्रांड योगी’ पर भारी पड़ती प्रशासनिक नाकामी
बहुमत पर ग्रहण: 257 से गिरकर 190-205 सीटों के रेड-ज़ोन में सिमटने की आशंका
अंदरूनी रिपोर्ट: भाजपा को 52 से 67 सीटों पर हार का सीधा संकट
सर्जिकल स्ट्राइक: एंटी-इनकंबेंसी मिटाने के लिए 77 से 90 सिटिंग MLAs की छंटनी की सिफारिश
हाईकमान का अल्टीमेटम: ‘सिटिंग विधायक’ होना टिकट की गारंटी नहीं, केवल परफॉर्मेंस ही पैमाना
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई, लखनऊ | उत्तर प्रदेश की सत्ता पर साल 2017 से काबिज भारतीय जनता पार्टी का ‘सुशासन’ और ‘सबका साथ’ का दांव अब खुद उसके अपने ही आंतरिक सर्वे के आंकड़ों में उलझकर बिखर गया है। 2027 के महासमर से पहले छनकर बाहर आई इस रिपोर्ट ने लखनऊ से दिल्ली तक के रणनीतिकारों के पसीने छुड़ा दिए हैं।
डबल इंजन सरकार के विज्ञापनों के भारी-भरकम ढोल के बीच जमीनी हकीकत यह है कि लगातार पेपर लीक से बेहाल युवा, थानों-तहसीलों में पसरा संस्थागत भ्रष्टाचार, UGC नियमों से उपजा सामाजिक असंतोष और इथेनॉल ब्लेंडिंग से तबाह होते वाहनों पर उपजा गुस्सा अब सीधे वोटबैंक को लील रहा है। यहाँ तक कि रामनगरी में अव्यवस्था और चढ़ावे में हेरफेर के आरोपों ने पार्टी के निष्ठावान कोर-वोटर को भी झकझोर कर रख दिया है।
अपनी ही नीतियों के इस 'प्रशासनिक लकवे' और 52 से 67 सीटों पर मंडराते हार के सीधे खतरे को ढांपने के लिए आलाकमान अब अपने ही 35 से 40 प्रतिशत मौजूदा विधायकों की 'राजनीतिक बलि' चढ़ाने की बिसात बिछा चुका है। जनाक्रोश का ठीकरा जनप्रतिनिधियों के सिर फोड़कर अपनी गिरती साख बचाने का यह पैंतरा असल में 5 साल के कुप्रबंधन को छिपाने की ही एक हताश कोशिश है। पिछले 15 वर्षों के रिकॉर्ड को देखें तो उत्तर प्रदेश में दल बदलने वाले नेताओं की तस्वीर चौंकाने वाली है। यूपी के मौजूदा 399 विधायकों में से 30% यानी 122 विधायक दल-बदलू हैं। मौका मिलने पर सांसद भी पार्टियां बदलने में पीछे नहीं रहे।
‘मिशन 2027’ पर संकट: 257 से खिसककर रेड-ज़ोन में पार्टी, पूर्वांचल में बगावत के सुर
आंतरिक आंकलनों के अनुसार, यदि मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव हुए तो 257 विधायकों का दंभ भरने वाली भाजपा सिमटकर 190 से 205 सीटों के बेहद नाजुक दायरे में अटक सकती है। 202 सीटों के बहुमत वाले प्रदेश में यह आंकड़ा खतरे की घंटी है। इस जन-असंतोष का सबसे तीखा केंद्र पूर्वांचल बना हुआ है, जहां विधायकों की निष्क्रियता, खनन और ठेकेदारी में लिप्तता से जनता का गुस्सा चरम पर है।
बीजेपी में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं की संख्या सबसे ज़्यादा है। अगर सपा से निकाले गए विधायकों को भी इसमें जोड़ लें, तो बीजेपी की कुल संख्या 260 हो जाती है। इनमें से 78 विधायक दूसरी पार्टियों से बीजेपी में शामिल हुए हैं, जो कुल संख्या का 30% है।
इसी एंटी-इनकंबेंसी को बेअसर करने के लिए रणनीतिकारों ने 77 से 90 अलोकप्रिय विधायकों के टिकट काटने का सुझाव दिया है। यह वही ‘नो-रिपीट फॉर्मूला’ है, जिसके तहत 2022 में भी 120 से अधिक टिकट काटे गए थे, हालांकि तब भी पार्टी की सीटें खिसककर 255 पर आ गई थीं।
नितिन नवीन की सख्त हिदायत: ‘सिटिंग MLA होना जीत का पासपोर्ट नहीं
लखनऊ में ताबड़तोड़ आयोजित उच्च स्तरीय बैठकों के दौरान भाजपा के कड़क रणनीतिकार नितिन नवीन का रुख बेहद तल्ख नजर आया। उन्होंने मंत्रियों और विधायकों को दोटूक चेताया कि केवल ‘मौजूदा विधायक’ होना टिकट की गारंटी नहीं बनेगा; उम्मीदवारी का एकमात्र पैमाना सिर्फ चुनावी जीत की क्षमता (विनेबिलिटी), जनता में वास्तविक स्वीकार्यता और संगठन का प्रदर्शन ही होगा। इसके साथ ही शीर्ष नेतृत्व ने साफ लहजे में चेतावनी दे दी है कि टिकट कटने पर कोई भी नेता निष्क्रिय होने या बगावती तेवर दिखाने की भूल न करे।
