15 लाख करोड़ के पार हुआ गोल्ड लोन बाजार, एनबीएफसी की चांदी
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | देश में कमरतोड़ महंगाई और बेरोजगारी के बीच आम जनता की आर्थिक बदहाली की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। रोज़गार के अभाव और रोजमर्रा के घरेलू खर्चों को पूरा करने के लिए अब मध्यम और निम्न वर्ग के पास अपना सोना गिरवी रखने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। जनता की इसी लाचारी और कर्ज लेने की अभूतपूर्व ज़रूरतों को भुनाने के लिए गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) बाज़ार में पूरी तैयारी के साथ बैठी हैं। कारपोरेट घरानों को बड़े लोन देने में कड़े होते नियमों के बाद, इन शैडो बैंकों ने अब अपना पूरा ध्यान आम आदमी की मजबूरी पर केंद्रित कर दिया है, जिससे सोने के बदले कर्ज का बाजार रिकॉर्ड रफ्तार से भाग रहा है।
रेटिंग एजेंसी ICRA और वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक, जो संगठित गोल्ड लोन बाजार साल 2014 में महज कुछ हजार करोड़ रुपये के दायरे में सिमटा हुआ था, वह साल 2026 तक आते-आते एक ऐतिहासिक ऊंचाई को छूते हुए 15 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अनुसार, इसमें से केवल एनबीएफसी (NBFCs) का ही गोल्ड लोन पोर्टफोलियो मई 2026 तक रिकॉर्ड 3.30 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। विश्लेषकों का मानना है कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह पूरा संगठित बाजार 18 लाख करोड़ रुपये के नए स्तर को छू सकता है, जो आम जनता पर बढ़ते कर्ज के असहनीय बोझ की एक डरावनी कहानी बयां करता है।
इस ग्रोथ के पीछे कोई औद्योगिक क्रांति नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं की नकदी का गहराता संकट है। इस साल मई में गोल्ड लोन सेगमेंट में सालाना आधार पर 70 प्रतिशत की विस्फोटक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो पिछले साल तक 39 प्रतिशत के स्तर पर थी। सिर्फ इतना ही नहीं, पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र ने लगभग 54 प्रतिशत की चक्रवर्धी वार्षिक विकास दर (CAGR) हासिल की है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद इस अवधि में एनबीएफसी की कुल क्रेडिट ग्रोथ भी सालाना आधार पर 11 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गई है।
इस आर्थिक संकट के बीच वित्तीय कंपनियों के लोन पोर्टफोलियो का पूरा गणित बदल गया है। एनबीएफसी की कुल लोन बुक में खुदरा कर्जों (रिटेल क्रेडिट) की हिस्सेदारी अब बढ़कर 43 प्रतिशत हो चुकी है, जो दो साल पहले 40 प्रतिशत से भी कम थी। इसके विपरीत, देश के विकास का दावा करने वाले बुनियादी ढांचा क्षेत्र (इंफ्रास्ट्रक्चर) को दिए जाने वाले औद्योगिक कर्जों में भारी गिरावट आई है और इसकी हिस्सेदारी घटकर महज 37 प्रतिशत रह गई है।
यह आंकड़ा साफ गवाही देता है कि देश में नए उद्योग लगाने या विकास कार्यों के लिए लोन की मांग पूरी तरह सुस्त पड़ चुकी है, जबकि आम जनता को अपना घर चलाने के लिए कर्ज की सख्त जरूरत है। सोने की बढ़ती कीमतों के बीच एनबीएफसी कंपनियां जनता की तात्कालिक जरूरतों को भुनाने के लिए आकर्षक ऑफर लेकर तैयार बैठी हैं, जिसके चलते प्रॉपर्टी पर लोन (LAP), माइक्रोफाइनेंस और पर्सनल लोन जैसे खुदरा क्षेत्रों में भी भारी उछाल देखा जा रहा है।
