गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को नए कलेवर में लॉन्च करने की तैयारी में सरकार
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/ नई दिल्ली | भारत में सोने (गोल्ड) को लेकर गहरा विरोधाभास हमेशा से चर्चा में रहा है। आम परिवारों के लिए यह सुरक्षित संपत्ति और पीढ़ीगत विरासत है, तो देश के नीति-निर्माताओं के लिए यह एक बड़ा समष्टि आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) सिरदर्द बना हुआ है।
वजह साफ है कि भारतीय हर साल जिस सोने को चाव से खरीदते हैं, उसका लगभग पूरा हिस्सा कीमती डॉलर खर्च करके आयात करना पड़ता है, जो बाद में पारिवारिक तिजोरियों में जाकर बंद हो जाता है। यह चक्र दर चक्र लगातार चलता रहता है, जिससे देश के पास सोने का एक विशाल पहाड़ तो खड़ा हो रहा है, लेकिन इसके निरंतर आयात के कारण देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार खाली होता जा रहा है।
हाल के महीनों में यह संकट तब और गहरा गया जब सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई भारी तेजी के कारण देश का आयात बिल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसने रुपये की सेहत पर सीधा दबाव बनाया। इस संरचनात्मक असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार अब ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ (GMS) को पूरी तरह नए कलेवर में पुनर्जीवित करने की तैयारी कर रही है। इस योजना की शुरुआत के बाद यह पहला मौका होगा, जब सरकार इस फ्लैगशिप स्कीम की पहुंच बढ़ाने के लिए स्थानीय ज्वेलर्स (सर्राफा व्यापारियों) की भागीदारी सुनिश्चित करने जा रही है, ताकि उनके पास मौजूद ग्राहकों के भरोसे और रेडी इंफ्रास्ट्रक्चर का सीधा लाभ उठाया जा सके।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) और हालिया औद्योगिक शोध रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय परिवारों और धार्मिक ट्रस्टों (मंदिरों) के पास लगभग 25,000 से 30,000 टन सोना निष्क्रिय पड़ा हुआ है। पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतों में आए जबरदस्त उछाल के बाद इस पूरे स्टॉक का मूल्यांकन वित्तीय जगत को चौंकाने वाला है।
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के ताजा आर्थिक अनुमानों के मुताबिक, जनवरी 2026 तक भारत में निजी तौर पर रखे गए इस सोने का कुल मूल्य $5 ट्रिलियन (लगभग 5 लाख करोड़ डॉलर) को पार कर चुका है, जो देश की कुल जीडीपी के लगभग 125 प्रतिशत के बराबर है। वहीं वैश्विक वित्तीय दिग्गज यूबीएस (UBS) ने भारतीय घरेलू स्वर्ण संपदा का मूल्य करीब $4.5 ट्रिलियन और मॉर्गन स्टेनली ने इसे $3.8 ट्रिलियन के आसपास आंका है।
आर्थिक मोर्चे पर इस समय ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन’ को गति देने की तात्कालिक वजह भारत का बाहरी क्षेत्र है। वित्त वर्ष 2026 में कीमतों में लगी आग के चलते सोने का आयात बिल 24 प्रतिशत की भारी उछाल के साथ रिकॉर्ड 71.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया, भले ही मात्रा के लिहाज से आयात घटकर 721 टन रह गया था।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी हाल ही में रेखांकित किया है कि देश के कुल व्यापार घाटे के आधे से अधिक हिस्से के लिए अकेले कच्चा तेल और सोना जिम्मेदार हैं। इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से सोने की खपत कम करने की सार्वजनिक अपील भी की थी। नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि जिस कमोडिटी का देश के भीतर पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है, उसी को दोबारा खरीदने के लिए देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार हर साल बाहर क्यों भेजा जाए।
वर्ष 2015 में लॉन्च की गई मूल गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम घरेलू बाजार में पूरी तरह सुस्त साबित हुई थी। नवंबर 2024 तक इस योजना के तहत देश भर के महज 5,700 जमाकर्ताओं से केवल 31 टन सोना ही जुटाया जा सका था, जो कुल उपलब्ध भंडार के सामने नगण्य है।
पारंपरिक गहनों को पिघलाने की हिचकिचाहट, शुद्धता जांच की जटिल प्रक्रिया और कम ब्याज दरों के कारण लोगों ने इससे दूरी बनाई, जिसके चलते सरकार ने 2025 में इसके कुछ हिस्सों को बंद कर दिया था।
अब बुलियन इंडस्ट्री के प्रस्तावों के आधार पर सरकार एक व्यावहारिक ‘सर्कुलर इकोसिस्टम’ बनाने पर विचार कर रही है। नए ढांचे के तहत, घरों और मंदिरों से जुटाए गए सोने को रिफाइन कर ‘इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स’ (EGR) में बदला जाएगा और बाद में ‘गोल्ड मेटल लोन’ के रूप में इसे वापस ज्वेलरी सेक्टर को ही वित्तीय आपूर्ति के तौर पर दे दिया जाएगा। यदि यह पुनर्गठित नीति जमीनी स्तर पर कामयाब होती है, तो घरेलू सर्राफा बाजार की मांग को घरेलू सोने से ही पूरा किया जा सकेगा, जिससे देश के चालू खाता घाटे (CAD) और रुपये की विनिमय दर को एक बेहद मजबूत और दीर्घकालिक सुरक्षा कवच मिल जाएगा।