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₹6.15 लाख करोड़ बैड लोन राइट-ऑफ: मोदी सरकार की ‘कॉरपोरेट मेहरबानी’ पर फिर सवाल

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✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | बीजेपी सरकार के ‘मजबूत बैंकिंग सिस्टम’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच आरटीआई से निकले नए आंकड़ों ने एक असहज सच्चाई सामने रख दी है। वित्त वर्ष 2024–25 में सितंबर 2025 में ही ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांटनेवाली सरकार के कार्यकाल में 1,24,655 करोड़ रुपये का राइट ऑफ किया गया है।

पिछले पांच वित्त वर्षों में बैंकों द्वारा 6,15,647 करोड़ रुपये के बैड लोन राइट-ऑफ किए जाने की पुष्टि खुद सरकार ने भी संसद में कर दी है। यह आंकड़ा पहले बताए गए 4.90 लाख करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा है, लेकिन सरकार की नीति-भाषा में इसे अब भी ‘सिर्फ लेखा प्रक्रिया’ कहा जा रहा है।

दिलचस्प यह है कि आम आदमी का छोटा-सा लोन बकाया हो जाए तो बैंक रिकवरी एजेंट, नोटिस और कोर्ट का रास्ता तुरंत खुल जाता है, लेकिन जब बात हजारों करोड़ के कॉरपोरेट कर्ज की आती है तो उसे बैलेंस शीट से ‘साफ’ कर दिया जाता है। सरकार का तर्क है कि राइट-ऑफ कर्ज माफी नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि अगर वसूली इतनी ही प्रभावी है, तो हर साल राइट-ऑफ का आंकड़ा नया रिकॉर्ड क्यों बना रहा है?

RTI डेटा के मुताबिक, FY 2024–25 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का राइट-ऑफ करीब 25% बढ़ा है। वहीं, एक अन्य RTI बताती है कि 2014 से सितंबर 2024 तक कुल 16.61 लाख करोड़ रुपये के एनपीए राइट-ऑफ किए जा चुके हैं। यह वही दौर है जिसे सरकार ‘आर्थिक सुधारों का स्वर्णकाल’ बताती रही है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार की नीतियां बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टर्स के प्रति नरम और आम करदाता के प्रति सख्त रही हैं। संसद में जब इस पर सवाल उठते हैं, तो जवाब मिलता है DRT, SARFAESI, NCLT और IBC जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन कानूनी रास्तों के बावजूद बैंकों का पैसा तेजी से डूबता जा रहा है।

सरकार भले ही इसे तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया कहे, लेकिन बढ़ते राइट-ऑफ आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि ‘कर्ज अनुशासन’ की सख्ती चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है, जबकि नुकसान की भरपाई अंततः सार्वजनिक धन से हो रही है।

वर्ष-वार राइट-ऑफ का ब्यौरा:

👉FY 2020–21: ₹1,33,384 करोड़
👉FY 2021–22: ₹1,15,748 करोड़
👉FY 2022–23: ₹1,27,238 करोड़
👉FY 2023–24: ₹1,14,622 करोड़
👉FY 2024–25 (सितंबर 2025 तक): ₹1,24,655 करोड़

 


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