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संविधान से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने के आरएसएस प्रस्ताव पर माकपा की कड़ी निंदा, विपक्ष ने भी साधा निशाना

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डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीआई-एम) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले के उस प्रस्ताव की कड़ी निंदा की है, जिसमें उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की।

विपक्ष ने इसे संविधान को नष्ट करने और भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की आरएसएस की दीर्घकालिक मंशा का हिस्सा बताया। विपक्षी दलों ने कहा कि ये शब्द भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की आकांक्षाओं को दर्शाते हैं, जो सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़े, लेकिन भाजपा सरकार संविधान की मूल भावना को नष्ट करने की कोशिश कर रही है।

माकपा ने आरएसएस पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने का आरोप लगाते हुए इसे ‘पाखंड’ करार दिया और संविधान के मूल मूल्यों की रक्षा के लिए जनता से एकजुट होने की अपील की।[]

कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव को संविधान विरोधी बताते हुए कड़ा विरोध जताया। राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, “आरएसएस का नकाब उतर गया। उन्हें संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहिए।” राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता लालू प्रसाद यादव ने इसे संविधान और लोकतंत्र पर हमला बताया। समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी आरएसएस-भाजपा की मंशा पर सवाल उठाए।

समाजवादी पार्टी (सपा) ने आरएसएस के प्रस्ताव की निंदा की। सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा, “संविधान हमारी एकता और समावेशिता का आधार है। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता भारत की आत्मा हैं। आरएसएस का यह प्रस्ताव देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार है।”

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने भी कड़ा रुख अपनाया। शरद पवार ने कहा, “ये शब्द संविधान की मूल भावना को मजबूत करते हैं। इन्हें हटाने की मांग भारत की विविधता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।”

दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने होसबोले के बयान का परोक्ष समर्थन किया। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि ये शब्द आपातकाल में जोड़े गए थे, और इस पर विचार होना चाहिए। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इसे समीक्षा योग्य बताया। यह विवाद बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को और गरमा रहा है।


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