मंत्रालय से पवई थाने तक सिर्फ ‘फॉरवर्ड’ होती रही फाइल
बिल्डर को मिला सेफ पैसेज, न बयान हुआ न एफआईआर
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | मंत्रालय की लालफीताशाही और बड़े कॉरपोरेट घरानों के बीच का गठजोड़ किस कदर गहरा है, इसका एक दस्तावेजी सबूत पवई के 14.5 एकड़ के प्राइम लैंड पार्सल में सामने आया है। लगभग 2,000 से 3,000 करोड़ रुपये के इस विवादित जमीन को हड़पने के खेल में राज्य की पूरी प्रशासनिक मशीनरी बिल्डर की कठपुतली बनकर रह गई है।
मुख्यमंत्री सचिवालय (CMO) से शुरू हुआ जांच का आदेश 20 महीनों के भीतर मंत्रालय के गृह, राजस्व और मुंबई पुलिस के आला अधिकारियों की 12 टेबलों पर केवल इनबॉक्स-टू-इनबॉक्स ‘ईमेल फॉरवर्डिंग’ का तमाशा बनकर सिमट गया। दूसरी तरफ, जमीन के मूल सह-स्वामियों के अधिकारों को कुचलकर नामचीन बिल्डर को खुलेआम अवैध निर्माण का ‘सेफ पैसेज’ मुहैया करा दिया गया।
12 टेबलों की कागजी दौड़ तक सिमटी शिकायत
प्राप्त आधिकारिक ईमेल ट्रेल के अनुसार, पीड़ित परिवार के विधिक वारिस राधेश्याम रामअवध यादव ने 29 दिसंबर 2024 को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चेताया था कि पवई (CTS 6A, 7/1A) और तीरंदाज (CTS 20, 22) की जमीन अदालत (Suit No. 4962/2006) में विचाराधीन है। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने 8 जनवरी और 11 जुलाई 2025 को राजस्व प्रधान सचिव को फाइल भेजी।
जब कोई हलचल नहीं हुई, तो अगस्त 2026 में मामला फिर सीएमओ पहुंचा। 11 अगस्त 2026 को सीएमओ ने इसे अपर मुख्य सचिव (गृह) मनीषा म्हैसकर को भेजा। 12 अगस्त को यह प्रधान सचिव (गृह विशेष) अनुप कुमार सिंह और फिर गृह विभाग के अधिकारियों राजाराम शिर्के व यमुना जाधव तक पहुंची।
आश्चर्य की बात यह भी है कि 14 अगस्त को पुलिस आयुक्त के दफ्तर से मात्र 14 मिनट के भीतर इसे डेस्क-12 (एप्लीकेशन ब्रांच) में सरका दिया गया। 24 अगस्त को यह अपर पुलिस आयुक्त (पश्चिम) और फिर डीसीपी जोन-10, एसीपी साकीनाका होते हुए पवई थाने पहुंची। लेकिन नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’।
कानून की धज्जियां उड़ी सरेआम, बीएनएनएस 173 को दिखाया ठेंगा
हैरानी की बात यह है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध की शिकायत होने के बावजूद पवई पुलिस ने न तो कोई प्राथमिक जांच की, न ही शिकायतकर्ता को बुलाकर बयान दर्ज किया। महाराष्ट्र सरकारी कर्तव्य विलंब प्रतिबंध कानून 2005 के तहत किसी भी टेबल पर 7 दिन से ज्यादा फाइल नहीं रुक सकती, मगर यहां 20 महीने सिर्फ खानापूर्ति में बिता दिए गए।
उक्त विवादित जमीन पर धारा 52 (लिस पेंडेंस) लागू होने के बावजूद बीएमसी अधिकारियों ने बिल्डर के प्रभाव में आकर प्लान पास करने की प्रक्रिया जारी रखी। इस प्रशासनिक मिलीभगत के खिलाफ अब पीड़ित पक्ष ने लोकायुक्त में धारा 12 के तहत एसआईटी जांच और जिम्मेदार नौकरशाहों पर केस दर्ज करने की मांग की है ।




