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व्यक्ति-केंद्रित सुरक्षा मॉडल: दीर्घकालिक राष्ट्र-हित या बड़ा रणनीतिक जोखिम?

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12 साल बाद भी भाजपा सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेहतर विकल्प ढूंढ़ पाने में नाकाम

✍️ विशेष संवाददाता, मुंबई | भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा ढाँचा आज एक अभूतपूर्व और गंभीर रणनीतिक दोराहे पर खड़ा है। जहां देश की संप्रभुता से जुड़े नीतिगत फैसले संस्थागत गहराई के बजाय एक ही चेहरा और एक ही कार्यशैली के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं।

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की ऐतिहासिक संरचना हमेशा से विशिष्ट ‘साइलो’ में बंटी रही है। आईपीएस आंतरिक सुरक्षा के रक्षक हैं, आईएफएस कूटनीति के मोर्चे पर डटे हैं, और सैन्य नेतृत्व सीमाओं की निगहबानी करता है। इन तीनों विधाओं को एक सूत्र में पिरोने वाले किसी एकीकृत संस्थागत कैडर या समानांतर ट्रेनिंग मॉडल को विकसित करने में हमारा तंत्र 12 वर्ष बाद भी विफल रहा है।

ऐसे में सवाल सीधा और चुभने वाला है क्या इस संस्थागत शून्यता को ढकने के लिए पूरे राष्ट्र की सुरक्षा नीति को ‘व्यक्ति-केंद्रित’ बना देना एक रणनीतिक मजबूरी थी या दूरदर्शिता की कमी? परखे हुए अनुभव और व्यक्तिगत निष्ठा के आवरण में नए विकल्पों को तैयार न करना, क्या भारत के दीर्घकालिक सुरक्षा हितों के साथ किया जा रहा एक बड़ा संस्थागत समझौता नहीं है?

​राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने 2014 के बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा को अत्यधिक केंद्रीकृत किया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद को केवल सलाह देने तक सीमित न रखकर निर्णय लेने का मुख्य धुरी बना दिया गया।

तर्क यह दिया गया कि पाकिस्तान और चीन जैसे दोहरे मोर्चे की चुनौतियों, डोकलाम और गल्वान जैसे सीमा विवादों, और उरी-बालाकोट जैसी जवाबी कार्रवाइयों के बीच किसी नए चेहरे को लाकर सुरक्षा डॉक्ट्रिन को रीसेट करने का ‘संस्थागत जोखिम’ देश नहीं उठा सकता था। परंतु, रक्षा विशेषज्ञों की दृष्टि में किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए एक ही व्यवस्था या व्यक्ति पर एक दशक से अधिक समय तक अत्यधिक निर्भरता अंततः एक बड़ा रणनीतिक जोखिम पैदा करती है।

​दीर्घकालिक परिदृश्य में यह परिपाटी देश की सुरक्षा के लिए अहितकर सिद्ध हो सकती है। जब सुरक्षा व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की कार्यशैली और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, तो संस्थागत सेकंड-इन-कमांड और उत्तराधिकार की भावी पाइपलाइन पूरी तरह सूख जाती है। खुफिया एजेंसियों (आईबी और रॉ), विदेश मंत्रालय और तीनों सेनाओं के प्रमुखों का कद धीरे-धीरे शीर्ष सलाहकार के पदानुक्रमिक आदेशों का पालन करने तक सीमित हो जाता है। इससे स्वतंत्र आकलन, वैकल्पिक रणनीतिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक राय की गुंजाइश खत्म होने लगती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब संस्थाएं व्यक्ति से छोटी होती हैं, तब-तब अचानक आए नेतृत्व परिवर्तन के समय देश के सामने गंभीर सुरक्षा शून्यता उत्पन्न होती है।

​आज भारत को एक ऐसे संस्थागत सुरक्षा मॉडल की दरकार है जहां नीतियां और रणनीतियां व्यक्ति-विशेष पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं, एकीकृत कैडर और सुदृढ़ प्रणाली पर आधारित हों। यदि 12 वर्षों के लंबे कार्यकाल के बाद भी देश के पास तीनों विधाओं का समावेश करने वाला दूसरा राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ मौजूद नहीं है, तो यह मौजूदा व्यवस्था की सफलता नहीं, बल्कि भारत के रणनीतिक व प्रशासनिक प्रशिक्षण मॉडल की एक बड़ी विफलता है। राष्ट्रीय सुरक्षा किसी एक कार्यकाल या व्यक्ति का बंधक नहीं हो सकती; इसे टिकाऊ, संस्थागत और कालजयी बनाना ही भारत के दीर्घकालिक हितों की असली गारंटी है।


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