BRICS Trade Deficit: ब्रिक्स में भारत का व्यापार घाटा $226 अरब पार, नई दिल्ली समिट से पहले GTRI की रिपोर्ट
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली/मुंबई | ब्रिक्स के मंच पर वैश्विक महाशक्ति बनने का ढिंढोरा पीट रहे भारत की व्यापारिक कूटनीति बुरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 11 देशों के शिखर सम्मेलन से ठीक पहले सामने आए ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों ने भारत की व्यापार रणनीति की कलई खोलकर रख दी है।
आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि रणनीतिक बढ़त बनाना तो दूर, भारत इस समूह के भीतर अपनी विनिर्माण और निर्यात क्षमता को बेचने में नाकाम रहा है और सदस्य देशों के लिए महज एकतरफा माल खपाने का बड़ा डंपिंग ग्राउंड बनकर रह गया है।
बीते पांच वर्षों में ब्रिक्स के साथ भारत का व्यापार घाटा $74.5 अरब से तीन गुना से भी ज्यादा की बेलगाम छलांग लगाकर वित्त वर्ष 2026 में रिकॉर्ड 226.1 अरब डॉलर के पार चला गया है। इस दौरान भारत का कुल व्यापार 417.5 अरब डॉलर जरूर पहुंचा, लेकिन इसमें निर्यात की हिस्सेदारी 22% से घटकर 21.7% पर सिमट गई, जबकि भारतीय बाजारों में ब्रिक्स के आयात की घुसपैठ 35.2% से बढ़कर 41.5% के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई।
भारत की इस नीतिगत नाकामी का सबसे बड़ा फायदा चीन, रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की तिकड़ी ने उठाया है, जो ब्रिक्स से भारत आने वाले कुल आयात का 84 फीसदी हिस्सा अकेले हड़प रहे हैं। सीमा विवाद और कड़े बयानों के दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि भारत का चीन पर आयात निर्भरता का शिकंजा और कस गया है।
पांच वर्षों में चीन से भारत का आयात दोगुने से भी अधिक बढ़कर 65.2 अरब डॉलर से 131.6 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि चीनी बाजार में भारतीय उत्पाद जगह बनाने में पूरी तरह नाकाम रहे और भारत का निर्यात 8.1 फीसदी गिरकर महज 19.5 अरब डॉलर पर आ गया। यानी अकेले चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर के पार निकल चुका है।
यही हाल रूस के मोर्चे पर रहा; सस्ते कच्चे तेल की आक्रामक और अनियंत्रित खरीद के चलते रूस से होने वाला आयात दस गुना से अधिक उछलकर 5.5 अरब डॉलर से सीधे 55.4 अरब डॉलर हो गया, मगर भारतीय कूटनीति रूस को अपने उत्पाद बेचने में कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाई और वहां भारत का निर्यात मात्र 4.5 अरब डॉलर पर ही रेंगता रहा।
यूएई ने भी भारत को 37.4 अरब डॉलर के निर्यात के मुकाबले 63.9 अरब डॉलर का माल थमा दिया। इंडोनेशिया, ईरान और इथियोपिया जैसे बाजारों में भी भारत अपनी पुरानी पकड़ गंवा चुका है और वहां निर्यात में गिरावट दर्ज हुई है।
यह विस्फोटक आंकड़ा तब सामने आया है, जब ब्रिक्स वैश्विक कच्चे तेल के 41 से 47 फीसदी उत्पादन, आधी आबादी और दुनिया की एक-चौथाई जीडीपी पर नियंत्रण का दावा ठोक रहा है। समूह 1.09 ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक व्यापार सरप्लस दर्ज कर बाहर तो अपना दबदबा दिखाता है, लेकिन अंदरूनी तौर पर यह पूरी तरह असंतुलित और चीन-केंद्रित मंच बना हुआ है।
सदस्य देशों का आपस में निर्यात उनके कुल निर्यात का मात्र 18.8 फीसदी है, जो वैश्विक व्यापार के पैमाने पर केवल 4.1 फीसदी बैठता है। बुनियादी ढांचे, साझा नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह समूह संकट के समय किसी सुरक्षा कवच के तौर पर काम करने की स्थिति में नहीं है।
ऐसे में नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया संकट जैसे बड़े मुद्दों के बीच सबसे असहज करने वाला सवाल भारत की अपनी व्यापार नीति पर होगा कि आखिर मौजूदा भाजपा सरकार कब तक वैश्विक मंचों पर अपनी कूटनीतिक जीत का ढिंढोरा पीटते हुए घरेलू बाजारों को सदस्य देशों के लिए बेलगाम डंपिंग ग्राउंड बनने की खुली छूट देती रहेगी?

