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‘नवरत्नों’ की बिक्री से राजकोषीय भरपाई: 12 साल में 5.10 लाख करोड़ से ज्यादा का विनिवेश

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  • मुनाफे वाले सरकारी उपक्रमों में हिस्सेदारी घटाने से भविष्य के राजस्व पर गहरा संकट

  • हिंदुस्तान कॉपर के 6% शेयर बेचकर जुटाए 3,000 करोड़, चालू वित्त वर्ष में आंकड़ा 55,700 करोड़ के पार

  • 80 हजार करोड़ के लक्ष्य की अंधी दौड़ में कमाऊ ब्लूचिप कंपनियों के शेयर बाजार के हवाले

  • स्थाई लाभांश पर कैंची, आरक्षण और सुरक्षित नौकरियों के अवसरों पर मंडराता गंभीर संकट

✍️ विशेष आर्थिक रिपोर्ट, मुंबई / नई दिल्ली | ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सियासी ढोल के बीच राजकोषीय घाटे की तात्कालिक खाई पाटने के लिए केंद्र सरकार ने देश की कमाऊ सार्वजनिक परिसंपत्तियों (सीपीएसई) की नीलामी की रफ्तार तेज कर दी है। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) में 6 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर 3,000 करोड़ रुपये जुटाते ही चालू वित्त वर्ष 2026-27 में विनिवेश का आंकड़ा 55,700 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। डीपैम (DIPAM) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 से 2025-26 के बीच जुटाए गए 4.55 लाख करोड़ रुपये और चालू वर्ष की प्राप्तियों को मिलाकर अब तक भाजपा सरकार 5.10 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय पूंजी को बाजार में खपा चुकी है।

80,000 करोड़ रुपये के सालाना विनिवेश लक्ष्य को पूरा करने की होड़ में भाजपा सरकार ने चालू वित्त वर्ष में ही एलआईसी (LIC) की 6.5% हिस्सेदारी बेचकर 31,515 करोड़ रुपये, कोल इंडिया से 5,542 करोड़ रुपये, एनएचपीसी से 4,357 करोड़ रुपये और जीआईसी से 3,090 करोड़ रुपये बटोर लिए। इसके अलावा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, आईआरएफसी और कोचीन शिपयार्ड जैसी मजबूत कंपनियों के शेयर भी बेचे गए। इससे पहले एयर इंडिया का निजीकरण और एचपीसीएल-आरईसी का अंतर-सरकारी हस्तांतरण कर खजाना भरा जा चुका है।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, बजट के तात्कालिक अंकगणित को साधने की यह नीति भविष्य के स्थाई राजस्व पर सीधा प्रहार है। जो नवरत्न और मिनीरत्न कंपनियां हर साल हजारों करोड़ रुपये का लाभांश (डिविडेंड) सीधे सरकारी खजाने में जमा करती थीं, उनमें शेयर कम होने से देश का नियमित राजस्व स्रोत स्थायी रूप से कमजोर हो रहा है। इसके साथ ही तांबा, कोयला, ऊर्जा और जहाजरानी जैसे संवेदनशील व रणनीतिक संसाधनों पर राज्य का सीधा संप्रभु नियंत्रण लगातार घट रहा है।

इस विनिवेश एक्सप्रेस का सबसे चिंताजनक पहलू सामाजिक न्याय पर चोट है। जब सार्वजनिक उपक्रमों में हिस्सेदारी घटती है, तो इसका सीधा असर संवैधानिक आरक्षण, स्थाई रोजगार और जनहितैषी मूल्य नियंत्रण पर पड़ता है। नीतिगत नियंत्रण गंवाकर और आने वाली पीढ़ियों की राष्ट्रीय परिसंपत्तियों को भुनाकर सरकार भले ही तात्कालिक वाहवाही बटोर ले, लेकिन दूरगामी तौर पर यह नीति देश की संप्रभु आर्थिक रीढ़ को खोखला कर रही है।

 


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