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भड़काऊ भाषणों पर ‘सिलेक्टिव न्याय’: कब रुकेगा दोहरापन?

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भारत की राजनीति में भड़काऊ भाषण अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक आम हथियार बन चुका है। चुनावी मौसम आते ही इस हथियार की धार और तेज हो जाती है—लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका इस्तेमाल करने वालों पर कानून समान रूप से लागू होता है? आंकड़े और हालिया घटनाएं कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।

2014 से 2020 के बीच देश में भड़काऊ भाषणों के मामलों में 500% की वृद्धि हुई—323 से बढ़कर 1,804 तक। इंडिया हेट लैब की 2024 रिपोर्ट बताती है कि 2023 में 668 घटनाएं दर्ज हुईं, जो 2024 में 74.4% बढ़कर 1,165 हो गईं। इनमें से 79.9% घटनाएं भाजपा शासित राज्यों में हुईं, और भाजपा ने अकेले ही 340 घटनाएं अंजाम दीं—2023 की तुलना में 580% अधिक।

इसके बावजूद, अदालत से सजा मिलने का सिलसिला बेहद पक्षपाती नजर आता है। आजम खान, अब्बास अंसारी, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे विपक्षी नेताओं को भड़काऊ भाषण के लिए न सिर्फ दोषी ठहराया गया बल्कि सजा भी दी गई। वहीं, भाजपा के बड़े नेताओं के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज होती है, लेकिन सजा कोई नहीं।

अब्बास अंसारी, जो बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के पुत्र हैं, को 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान भड़काऊ भाषण देने के मामले में दो साल की सजा और 3,000 रुपये जुर्माना हुआ। इससे पहले आजम खान को भी 2019 के एक बयान पर तीन साल की सजा मिली थी, और उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी गई थी।

वहीं, सत्ता पक्ष की सूची देखें तो स्थिति बिलकुल अलग नजर आती है।

योगी आदित्यनाथ, जिन पर 2007 के गोरखपुर दंगों के दौरान भड़काऊ भाषण का आरोप लगा, उनका मामला CBI तक गया, लेकिन 2017 में यूपी सरकार ने केस की मंजूरी ही नहीं दी, और मामला खत्म हो गया।

अनुराग ठाकुर, जिन्होंने 2020 में “देश के गद्दारों को…” जैसा नारा लगाया, उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस तो दिया, लेकिन न कोई चार्जशीट, न सजा।

कपिल मिश्रा, जिनके बयान के बाद दिल्ली में दंगे भड़के, आज भी आज़ाद घूम रहे हैं—न गिरफ्तारी, न कोई अदालती कार्रवाई।

साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति, प्रज्ञा ठाकुर जैसे नेता लगातार आपत्तिजनक बयान देते रहे हैं—“गोडसे देशभक्त”, “रामजादे बनाम हरामजादे”—लेकिन चुनाव आयोग की चेतावनी के अलावा कुछ नहीं।

यह दोहरापन तब और गंभीर हो जाता है जब आप जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 पर नजर डालते हैं, जो स्पष्ट रूप से कहती है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में इस नियम को और सख्त बनाया, लेकिन आज भी इसका प्रभाव चुनिंदा मामलों तक सीमित है।

एडीआर की 2024 रिपोर्ट में सामने आया कि 543 सांसदों में से 251 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 171 गंभीर प्रकृति के हैं—जैसे हत्या, बलात्कार और अपहरण। इसमें बीजेपी के 301 सांसदों में से 116, कांग्रेस के 52 में से 29, और जेडीयू के 16 में से 13 सांसद शामिल हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में क्रमशः 82% और 56% सांसद दागी हैं।

2019 की केंद्र सरकार में शामिल 78 मंत्रियों में से 42% मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से 31% पर गंभीर आरोप थे। इसके बावजूद, सत्ता पक्ष के किसी भी बड़े नेता को आज तक भड़काऊ भाषण के लिए न दोषी ठहराया गया, न सजा सुनाई गई।

इस व्यवस्था में भाषण तो भड़काऊ होते हैं, लेकिन कानून की लपटें केवल विरोधियों को जलाती हैं। चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक, सभी संस्थाएं कार्रवाई तो करती हैं, लेकिन जब बात सत्ता पक्ष की होती है तो या तो जांच रुक जाती है, या अनुमति नहीं मिलती, या फिर फाइलों में गुम हो जाती है।

इस सिलेक्टिव प्रक्रिया से लोकतंत्र की नींव हिलती है, और नागरिकों में न्याय व्यवस्था को लेकर अविश्वास गहराता है। कानून अगर सभी के लिए समान नहीं है, तो न्याय केवल एक सपना रह जाता है, जिसे केवल विपक्ष भुगतता है और सत्ता उपहास बनाती है।

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